कुछ धृष्टता की है जो मेरे दूसरे ब्लॉग मन की बात पर पढ़ी जा सकती है।
बहुत दिनों से लिख रही हूँ और सोच रही हूँ कि प्रकाशित कर दूँ पर जब हो जाए तभी ठीक है।
( वहाँ मैं अपनी सोच ही लिखूंगी। मेरे विचार में गीता धर्म और संप्रदाय जैसे शब्दों से ऊपर जीने की कला है, मनोबल वृद्धि का सामान है। अपनी सोच रख रही हूँ बस)
टैग: धृष्टता
अक्टूबर 7, 2009 को 16:57 पर |
बिलकुल सही कहा आपने….
पर कहना चाहूंगी कि आपका प्रयास किसी भी मायने छोटा नहीं है……..
अक्टूबर 7, 2009 को 12:14 पर |
बहुत सुंदर प्रयास है आपका। बधाई।
करवाचौथ और दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।
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बोटी-बोटी जिस्म नुचवाना कैसा लगता होगा?