
यौं रहीम कैसे निभै, बेरे-केर कौ संग।
वो डोलत रस आपनै, उनके फाटत अंग॥
साहित्य अगर बेर का वृक्ष है तो ब्लॉग केले का वृक्ष।
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मौलिक और स्वाधीन व्यक्तित्व
लाली अपने माता-पिता की इकलौती संतान है। लाली के पिता चाय का खोका चलाते थे। पर शराब और गुटके की लत के चलते क्षय-रोग से क्षय हो गए। अब घर में रह गयी लाली और उसकी मम्मी। लाली छठी में पढ़ती थी। उसकी माँ अनपढ़, ठेठ गाँव की शर्मीली और घुंघट निकालने वाली थी। लोगों को पता चला तो उसके घर शोक प्रकट करने जाने लगे। कुछ आर्थिक मदद और दान भी दे गए।
लाली की माँ हर तरफ़ से परेशान थी। घर का खर्च कैसे चलाए? बाहर जाकर किसी से कभी बात नहीं की। पति जाने ही नहीं देता था। पर कुछ लोगों ने उसका हौंसला बढ़ाया और उसे उस चाय की दुकान चलाने में मदद की। साल-छः महीने में वह अपनी दुकान चलाने लग गयी।
लाली बहुत सुंदर और एक्टिव। भाग-भागकर काम करती। सदा मुस्कराती रहती है।
पर अपने को समृद्ध और चतुर समझने वाली कुछ स्त्रियाँ लाली में विशेष ध्यान देने लगीं। वह उसे अपने बच्चों के उतरे कपड़े दे देतीं तो कभी खाने की कोई चीज़ जो उसके लिए दुर्लभ थी। लाली छोटी बच्ची थी वह उनके प्रभाव में आगयी। वे स्त्रियाँ लाली की बहुत तरीफ़ करतीं। लाली का मन उनके पास ही लगने लगा। वह अपने घर से उनके घर भाग जाती। उसका मन पढ़ाई में न लगकर उनके कामों में ज़्यादा लगता।
किसी अध्यापिका के पूछने पर भोली लाली ने सब बात बता दी। अध्यापिका का माथा ठनका। उसने लाली की माँ को तुरंत बुलाया और समझाया कि वे स्त्रियाँ लाली को लालच देकर घर में नौकरानी बनाना चाहती हैं। जब यह पढ़ेगी नहीं तो स्वयं ही कहीं काम करने लगेगी।
लाली की माँ समझ गयी। उसने अपना घर बदल दिया और लाली को भी सख्ती से समझा दिया कि पढ़ाई करनी है न कि लालच। अब लाली दसवीं में आगयी है और मन लगाकर पढ़ रही है।
न जाने कितनी लालियों पर चाहे वे किसी उम्र की क्यों न हों लोगों को स्वार्थवश उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व मारने में मज़ा आता है।
Tags: मौलिकता, लोभ-लालच, व्यक्तिगत, व्यक्तित्व, साहित्य और ब्लॉग, स्वाधीनता
July 5, 2009 at 21:24 |
sundr post.
July 5, 2009 at 20:33 |
लाली के बहाने आपने कड़वी सच्चाई उजागर की है.
July 5, 2009 at 20:24 |
सकारात्मक सोच को दर्शानेवाला, हौसला बढ़ानेवाला और जन कल्याणकारी दृष्टांत।
July 5, 2009 at 19:25 |
सही लिखा आप ने
July 5, 2009 at 15:59 |
स्वार्थों की बारीकी पर एक हैंडलेंस।
इतनी सरल भाषा में कितना बड़ा पर्दाफाश !
बधाई – एक ‘घाव करे गम्भीर’ जैसी रचना पर।
July 5, 2009 at 15:53 |
बेहतर प्रविष्टि । आभार ।
July 5, 2009 at 15:32 |
प्रभावपूर्ण लेखन…
July 5, 2009 at 15:25 |
बहुत सही कहा आपने. गरीब घरों के बच्चों को इस तरह लालच देकर बरगला लिया जाता है और उनकी अंतिम परिणिती भी कोई बहुत अच्छी नही होती.
बेहतर इनको प्रोत्साहन देकर आगे पढने लिखने का मौका दिया जाये. बहुत शुभकामनाएं.
रामराम
July 5, 2009 at 14:59 |
प्रेमलता जी
आपके भावपूर्ण संस्मरण बहुत अच्छे लगे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मै कोई कहानी पढ़ रहा हूँ .