वापिसी में चलते ही पुनः तेज बारिश शुरु हो गयी। पर घोड़े वालों को हमसे ज़्यादा जल्दी थी बालटाल पहुँचने की । वे बेचारे भी सुबह से अबतक चलते-चलते थक चुके थे।
सुबह विकट जाम को देखते हुए मिलट्री ने वापिसी में घोड़ों का मार्ग थोड़ा लंबा कर दिया था। हमें पंचतरणी के किनारे-किनारे आगे जाकर घूमकर फिर मुख्य मार्ग से मिलना था। पर यह क्या बीच रास्ते में जैसे ही बर्फ़ से ढकी हुई की पंचतरणी के किनारे आए वैसे सी घोड़े वालों ने सवारियाँ उतार दीं। वहाँ बर्फ़ ताज़ा पड़ी थी। घोड़े भी फिसल रहे थे। हम ही जानते हैं वह दूरी हमने कितनी कठिनाई से पार की। सोनू, घोड़े वाले और मिलट्री के जवानों के अलवा किस-किस ने हमे पकड़कर वह रास्ता पार कराया! फिर भी हम कई बार फिसले और लुढ़के। बस बाबा की कृपा से नदी में न समाए! धीरे-धीरे उस बर्फ़ीली-फिसलन
को पार करके संगमटॉप पर जाकर पुनः घोड़े पर बैठ गए, तब जान में जान आयी।
पंचतरणी का क्षेत्र-मानों हीरे-मोती का पहाड़! उस पर पड़ती सूर्य की किरणें जब इंद्र-धनुष बना रहीं थीं तो वह नैसर्गिक-छटा अवाक! निःशब्द! सम्मोहित कर लेने वाली छ्टा!!!
धीरे-धीरे अंधेरा होने लगा। हम थके हुए चुपचाप आगे बढ़ते रहे। बुराड़ी पर घोड़े वालों ने चाय पी। वहाँ पहले भारी बर्फ़ पड़ी फिर तेज बारिश होने लगी। पर आगे बढ़ते रहे।
लगभग नौ बजे हम बालटाल वापिस आगए। आते ही क़्यूम ने कहवा पिलाया और सिगड़ी दी हम कुछ ही पलों में सो गए।
अगले दिन लगभग नौबजे हमने भोले-बाबा के जयकारों के साथ, बालटाल को बाय-बाय कह दिया। दर्शन की खुशी में सभी संतुष्ट थे। जो दृश्य हमने नहीं देखे थे,क्योंकि हम दूसरी साइड में बैठे थे, वो अब कैमरे में इक्ट्ठे
किए जा रहे थे। केसर के खेत इस समय सूखे हुए थे। अब वहाँ क्यारियाँ बनायी जाएँगी।
बीच में कंगन और अन्य जगहों से सब लोगों ने ड्राई-फ्रूट्स, चैरी और क्रिकेट के बैट्स खरीदे।
देर शाम को हम पुनः डल किनारे पहुँच गए। हमने राजू-लॉज में फिर डेरा डाला और बहुत थके होने के कारण ज
ल्दी सो गए।
अगले दिन हम पुनः श्रीनगर की सड़कें नापते रहे। जो अच्छा लगा खरीदते रहे। राजू ने हमें अच्छी क़िस्म के मेवे सही दामों पर दिलवाए। पूरा दिन और रात यूँ ही बिताकर अगले दिन कश्मीर को अलविदा कहने के लिए चल पड़े।
रात आठ बजे हम टनल से बाहर आ गए। यानि जम्मू में प्रवेश कर गए। आगे बढ़े तो कुड से पतीसा और लड्डू-बर्फ़ी ( वहाँ की प्रसिद्ध मिठाइयाँ हैं) खरीदीं।
रात भर बस के सफ़र ने बुरी तरह थका दिया। सुबह नौबजे अमृतसर में थे। होटल में तरोताज़ा होकर अमृतसरी-नान खाने निक
ले। शिंकजी और लस्सी पी। अचार-पापड़ और वड़ियाँ खरीदी। कई मंदिरों के दर्शन किए।
जलियाँवाला-बाग़ देखने गए। हम बाग़ में
टिलटिलाती धूप में भी ठंड जैसी सिहरन महसूस कर रहे थे जब हमने गोलियों के निशान और वह कुआँ देखा। क्रूरता और जघन्यता का प्रमाण!!!
पास में ही स्वर्ण-मंदिर है। वहाँ दर्शन करने गए। तेज़ धूप और गर्मी चरम पर थी। फिर भी इतनी पवित्र जगह को देखने पर शांति मिल रही थी। मंदिर में अपार भीड! पर मंदिर! बहुत ही सुंदर!!!
शाम को हम वाघा-बॉर्डर पर कार्यक्रम देखने गए। इतनी धूप और तपन में हजारों की संख्या में लोग- बच्चे-बूढ़े और जवान सभी देश-प्रेम का भाव लिए जमकर बैठे थे। वहाँ बस – ’वंदेमातरम’!!
!, ’भारतमाता की जय’!!! और’हिंदुस्तान-ज़िंदाबाद!’ के निर्मल भाव के अतिरिक्त कुछ न था। यही भाव था जो लोग ऐसी गर्मी में कार का शीशा भी न खोलें पर वहाँ अपने एक-एक दो-दो साल के बच्चों को गोद में लिए आग उगलती पत्थरों की सीढ़ियों पर मस्ती में नारे लगा रहे थे। कुछ देश-भक्ति के गीत संगीत और नृत्य के बाद विधिवत झंडे उतारकर रखे गए और गेट बंद हो गए। गेट के पार पाक़िस्तानी भाई-बहिन भी नज़र पड़ रहे थे।
अगली सुबह हम घर आ गए। इस तरह हमने अपनी यह यात्रा समाप्त ही।
Tags: अमृतसर, जलियांवाला-बाग़, वाघा-बॉर्डर, स्वर्ण-मंदिर
July 3, 2009 at 06:11 |
यह भी बढ़िया रहा!! आभार साथ साथ सैर कराने के लिए.
July 2, 2009 at 23:10 |
सुंदर सफर -अमिट यादें और सुखद समापन,बधाई .
उ= धन्यवाद मनोज जी!