जोशीमठ पर जैसे ही जाने का मार्ग खुला गाड़ियाँ इत्यादि वाहन जल्दी में गति पकड़ने लगे मानों रुकने के कारण लगे समय को पूरा करना चाहते हों। इतनी तेजी की कोई ज़रुरत नहीं। घुमावदार संकरे रास्ते पर आपा-धापी बिल्कुल नकार देनी चाहिए पर सब पता होने पर भी मानता कोई नहीं।
कोई प्लांट पूरे-ज़ोर-शोर से चल रहा था। कहीं पहाड़ कट रहे थे तो कहीं सुरंग में प्लास्टर चढ़ रहा था। वही मैदानी इलाक़े सी मशीनों की तेज और तीखी आवाज़ें कोमल-कांत पर्यावरण में चरम ध्वनि-प्रदूषण भर रही थीं। यह तो मानव और टैक्नाल्जी की चढ़ाई के सोपान थे। पर मुझे इतनी सुंदरता में इतना क्रूर विकास श्रीमद्भागवत-पुराण में वर्णित राजा पृथु का पृथ्वी को धमकाने जैसा लगा-
”इति व्यवसितो बुद्ध्याप्रगृहीतशरासनः।
सन्दधे विशिखं भूमेः क्रुद्धस्त्रिपुरहा यथा॥”
”मन्वधावत्त्द्वैन्यः कुपितोsत्यरुणेक्षणः।
शरं धनुषि संधाय यत्र यत्र पलायते॥”
यहाँ भी पृथ्वी तब की तरह निरीह लगी। पर तब की चेतावनी को अब भी समझना चाहिए-
”मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्वं प्रतिष्ठितं।
आत्मानं च प्रजाश्चेमाः कथमम्भसि धास्यसि॥”
और-
अपामुपस्थे मयि नास्व्यवस्थिताः
प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल।
स वीरमूर्तिः सम भूद्धराधरो
यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि॥
इससे आगे बढ़े तो देखा कि अनेक अति युवा, या कहें तो युवा हुए कुछ समय भी न निकला होगा मोटरसायकिल पर तेजी से आते-जाते नज़र आये। उन्हें कोई परवाह ही नहीं थी कि वे हाइ-वे पर चला रहे हैं या अति ऊँचाई वाले पहाड़ी संकरे रास्ते पर। ये सब उत्साही युवक
हेमकुंड-साहिबजी और बद्रीनाथ के दर्शन करने वाले पगधारी सरदार थे।
चारों ओर फैले पहाड़ों को देखकर ऐसा लगता मानो बनाने वाले ने इतनी तबियत से ये दृश्य बनाए होंगे कि पलक तक न झपकी होगी कहीं कुछ ग़लत न हो जाए। वाह! रे रचनाकार! ’अजब तेरी कारीगरी रे करतार”। ऊपर पहाड़ तो नीचे अलकंनदा! श्वेत, निर्मल खेलती-कूदती अल्हड़ यौवना मानों मस्त! दुनिया के छ्ल-कपट से दूर अपनी धुन में गुनगुनाती, कभी अलाप लेती तो कभी मंद स्वर में अपने अलौकिक सौंदर्य का दर्शन कराती पूरे रास्ते मानों बतयाती चलती रही!” डरो मतो यहाँ कोई डर की बात नहीं है। मैं रास्ता बता तो रही हूँ मैं जहाँ से आ रही
हूँ उसी ओर चलते चले जाओ!”
धीरे-धीरे करके हम बाबा बद्री-विशाल; के प्रांगण में पहुँच गए। पंक्ति में लगकर नंबर पर दर्शन किए( यह हमारा उसूल है)। कहते हैं मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। क्या कहें प्राण की बात पर ? पर भावातिरेक में मूर्तियाँ बोलती सी नज़र आती हैं। जब भाव प्रबलतम हो और शरीर बोध अल्प हो जाए तो मूर्ति तो सजीव लगेंगी हीं?
हम परिक्रमा कर रहे थे तो देखा मंदिर का कोई कार्य-कर्ता अंदर आँगन में झाड़ू से सफ़ाई कर रहा है, पर इनसब का मन काम में नहीं था, वो तो बस यात्रियों के पुरोहित बनने में ही व्यस्त रहना चाहते हैं। हमसे रहा न गया क्योंकि पूरे आँगन में प्रसाद की चिपकन और बड़े-बड़े और मोटे-मोटे चींटें फैले हुए थे। हमने उससे कहा हमें झाड़ू दे दो हम लगा देते हैं। वह थोड़ा सकपका गया और तेजी से गंदगी इधर-उधर जे जाने लगा। हमें देखकर कई दर्शन कर चुके लोग भी सफ़ाई करने की ज़िद्द करने लगे। इतने ही उनका प्रबंधक भी आगया। इकट्ठे लोगों को देखकर सोचा क्या गड़बड़ है। कहीं पत्रकार तो नहीं हैं? बिना देखे ही बोला फोटो नहीं ले सकते अंदर के भाग की। सभी ने उसे बात बतायी और कहा हम मंदिर में कर-सेवा करना चाहते हैं। वह मान गया उसने झाड़ू दिलवा दी। हम सभी इच्छुक लोगों ने मंदिर में झाड़ू लगाकर पाइप लगाकर पानी से धोया और मन को सुखद भाव से भर लिया। जब हम सफ़ाई कर रहे थे तो मध्यांतर हो गया और हम अंदर ही बैठ गए। पुनः जब मंदिर दर्शनार्थ खुला तो आरती और दर्शन का सुख लेकर बाहर आ गए। जब बाहर आकर लोगों को यह बात पता चली तो वे हमसे ईर्ष्या से भर गए काश! हम भी कर-सेवा कर लेते!!! हमें किसी भी सार्वजनिक जगह चाहे वह पूजास्थल हो या कुछ भी स्थल वहाँ
की सफ़ाई और स्वच्छ्ता का ध्यान रखना चाहिए। कर-सेवा ही सच्ची पूजा है।
नर-नारायण पर्वत के मध्य बद्रीनाथ का मंदिर बहुत भव्य है, आकर्षक है। प्रकृति की गोद में बिल्कुल बैठा सा प्रतीत होता है, पर यह क्या बैकुण्ठ के द्वार पर माया-जाल? मंदिर तो छिप गया है। अपने आसपास बन गए छोटे-बड़े होटलों, धर्मशालाओं, विश्राम-घरों और आश्रमों के कारण। मायामोह की चकाचौंध में हम बिल्कुल बौरा गए। क्या हम शुद्ध मन से दर्शन कर सकते है यदि मन में तो व्यवसाय की हिलोरें उठ रही हों? तीर्थ की कठिनाइयाँ ही उसका महत्त्व बढ़ाती
थीं। इतनी ऊँचाई पर मंदिर भी प्रकृति के सौंदर्य के दर्शन करने के लिए बनाए गए। एकांत में सच्ची शक्ति क़ुदरत से भी साक्षात्कार हो सके। पर मंदिर तो आय का स्रोत बन गया है। क्या पुजारी और क्या भक्त सभी रुपया कमाने की जुगत में भगवान को बूढ़े की तरह कोने में दबाए दे रहे हैं। यही हाल अलकनंदा का है।
इतनी बातों के होने के बाद भी वहाँ के अद्भुत नज़ारे और प्रकृति की क्रीड़ाएँ सबको मंत्र-मुग्ध कर देती हैं। हम दो बार जा चुके हैं। अभी हेमकुंड-साह्ब जी के दर्शन करने की लालसा एक चक्कर तो अवश्य लगवाएगी। पर पता नहीं कब?
Tags: अलकनंदा, नर-नारायण पर्वत, बद्रीनाथ
May 17, 2009 at 23:05 |
gyaan vardhak aur sansmarnaatmak aalekh ke liye badhaai.
vijay
May 17, 2009 at 21:30 |
बहुत अच्छा आलेख, धन्यवाद!
May 17, 2009 at 19:15 |
बहुत अच्छी यात्रा करवाई आपने…
Ans.= धन्यवाद! टिप्पणी हेतु।
May 17, 2009 at 18:49 |
बहुत अच्छा यात्रा वृतांत और तस्वीरों में दर्शन.
पहाड़ भी विकास की कीमत चुका रहे हैं. भविष्य तकलीफदेह हो सकता है इससे.
उ०= धन्यवाद! टिप्पणी हेतु।
May 17, 2009 at 17:43 |
यात्रा संस्मरण बहुत अच्छा लगा!!
उ०= धन्यवाद|
May 17, 2009 at 16:57 |
भूल सुधार *
* निजायत = निहायत
उ०= धन्यवाद टिप्पणी हेतु।
हमने भी लेख में टाइपो (त्रुटियाँ) सुधार दी हैं।
May 17, 2009 at 16:57 |
बाबा बद्री विशाल के दर्शन और आपका यात्रा वृतांत निजायत ही सजीव लगा. आपका यह वाक्य
पर मुझे इतनी सुंदरता में इतना क्रूर विकास श्रीमद्भागत-पुराण में वर्णित राजा पृथु का पृथ्वी को धमकाने जैसा लगा-”
बहुत कुछ कह गया है.
रामराम.