
बद्रीनाथ से कुछ दूरी पर माणा गाँव है। इस पर पहले भी कुछ लिखा था। आज कुछ तस्वीरें और हैं|
माणा गाँव सीमा पर और उँचाई पर होने के कारण यहाँ बसापत बहुत कम है। इन्ही कुछेक महीनों में जब बर्फ पिघल जाती है तो घुमक्कड़ यहाँ जाते हैं। बद्रीनाथ के दर्शन करने वाले लोग माणा गाँव भी जाते हैं।
पतली संकरी पहाड़ी पगडंडियाँ जिनके एक ओर सरस्वती (सरस्वती-नदी का विडिओ देखें)अपने तीव्रतम प्रवाह के साथ अभिवादन करती है और दूसरी ओर टीले नुमा पहाड़ तो मन काँप सा जाता है। इतना उतार-चढ़ाव! और संकरा भी ! कहीं-कहीं तो दो फुट तक की कूद लगानी पड़ी! इतना डर कि लगे अब गिरे तब गिरे। चलते समय तो पूरा ध्यान चलने पर ही रहता है, इधर-उधर देखने में डर लगता है कब सरस्वती से जा मिलें? इसलिए रुककर ही दृष्यों को देखा। हम शाम को गए थे। ठंड बहुत और अंधेरा हो गया सरस्वती कें मंदिर में ही। लौटकर आते में तो और भी ठंड!
वहाँ सीमा-सुरक्षा बल के जवान बड़ी सतर्कता से अपनी ड्यूटी करते दिखायी दिए। वे किसी से बोल नहीं रहे थे पर रास्ता पूछने पर हाथ के इशारे से बता रहे थे। ड्यूटी खत्म होने पर वहीं बने निवास-गृहों में वे रुक जाते हैं। एक जवान का परिवार भी आया हुआ था वहीं पर कई सारे जवान चाय-नाश्ता करके गपशप कर रहे थे। कई जवान बहुत छोटी आयु के थे। यह सब हमें मेरठ के एक जवान ने बताया।
वहाँ इन घरों के आसपास ही छोटे-छोटे खेत और तरक़ारी-सब्जियाँ उगाई हुई थीं। लगभग सभी घरों में कुत्ते थे। पर पर्यटकों को देखकर भौंक नहीं रहे थे।
एक लडकी से पूछा तो उसने बताया कि सर्दियों में वे देहरादून चले जाते हैं वहाँ भी एक घर बनाया हुआ है। पढ़ाई-लिखाई वहीं करते हैं।
वहाँ के मूल निवासी चीनी जैसे लग रहे थे। न तो वे बोले और न हम। वे आपस में जो बात कर रहे थे वे भाषा हमें पल्ले न पड़ी।
हर दो क़दम पर चाय की दुकान थी वहाँ सब कुछ खाने को मिल रहा था- चाय-कॉफी, ब्रेड-पकौड़ा, चिप्स, नमकीन इत्यादि।
हमने रास्ते में चाय पी। वापिसी में देखा कि रोशनी में कुछ दुकान टाइप भी हैं-हाथ से बने सामान की। कालीन, दरी, कंबल, शॉल,स्वेटर , गुलीबंद के अलावा गृह-सज्जा का भी सामान था। हमने शॉल खरीदा।
आते-आते रात हो गयी। ठंड से दंत-वीणा की स्वर-लहरी आलाप लगाने लगी। संगत कर रहे थे पहाड़ी झींगुर, जुगनु और अन्य कीट-पतंगे जो रात होने पर ही हलचल करते हैं। उनकी गुझन में एक अलग आकर्षण था!!!
धुंध छा गयी थी रास्ता ज़्यादा दूरी तक दिखायी नहीं दे रहा था, पर हमने देखा कि बहुत छोटे बच्चे नीचे की ओर बने घरों की छतों पर इतनी ठंड में भी खेल-कूद रहे थे।
May 15, 2009 at 14:13 |
बहुत खूबसूरत है आपका गांव। और आप लोग इतने ही खुश नसीब कि प्रकृति की वादियों में रहते हैं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
May 14, 2009 at 21:05 |
“माणा गाँव” से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद.
उ०= धन्यवाद टिप्पणी हेतु।
May 14, 2009 at 12:00 |
अभी तक तो उधर जाने का नसीब नहीं हुआ, लेकिन आपकी लेखनी ने हमें भी बर्फीली वादियों का विचरण करा दिया। शुक्रिया।
ans.= शुक्रिया।
May 14, 2009 at 06:39 |
सर्दियों में देहरादून तो नहीं, हां छिनका – पीपल कोटी से आगे कर्णप्रयाग के रास्ते पर, वहां माणा वाले रहते हैं। अब देहरादून तो राजधानी हो गया है तो किसी को भी खींच लेता ही होगा। माणा और छिनका दो गांव तो स्पष्ट हैं उनके।
उ०= विजयजी वह परिवार देहरदून में रहता होगा। टिप्पणी केलिए धन्यवाद।
May 13, 2009 at 23:57 |
अच्छी जानकारी!
उ०= धन्यवाद दिनेशजी!
May 13, 2009 at 23:42 |
I have been there thrice. People living there are of Tibetan origin and the present generation is highly educated. Some of young men are in Civil services while others are doctors or army officers.Villagers here live in difficult terrain but have blessings of ma Saraswati as well. Visitors should respect these special village folks.
उ०= मुनीशजी दो बार तो हम भी हो आए हैं:) अभी हेमकुंडसाहिबजी रह गए हैं। वहाँ के बहुत लोग फौज में भी हैं। अच्छी टिप्पणी! धन्यवाद।