ओ मुनिया!
अरी ओ मुनिया!
जल्दी से उठ जा!
सुनती है न? सुनती?
उठ जा!
सवेरो ह्वै गयो है,
लाला उठ गयो है,
पड़ी सन्ना रई है!
क्यूँ न उठकै आ रई है?
चूरौ जर रौ ह्वै,
लकरी बेकार जरेगी,
तनि उठ!
भैयाकू गोदी लैले,
मौंकू देर ह्वै रैये,
काम पै देर ह्वै जायगी,
मालिक किल्लावेगो,
तोकू सुनांई नाय परे,
बैरी ह्वै गयी का?
सारो जिम्मो मेरो ही है?
बाप तो बाहिर बीरी फूंक रौ है,
तू यौं झिकाय रईअ,
मैंई तो कमाकै लाऊँ,
फिर बना कै ठूसाऊँ,
सारे दिन मजूरी करूं,
सबको पेट भरूँ!
सुने मजूर-दिवस है?
मजूरनी तो विवस है!
दिवस-फिवस की काह?
के फायदा? जो मनाऊँ याह?
Tags: मजदूर-दिवस, मजदूरनी
May 14, 2009 at 00:30 |
man ko choo lene wali har nari ki kahani kahati kavita.
May 7, 2009 at 17:29 |
सीधी सादी, पर दिल को छू जाने वाला अंदाज। बधाई।
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SBAI TSALIIM
May 2, 2009 at 01:24 |
इस जुबान में गीत सुनने का अलग आनन्द है, आपका आभार.