सार और थोथा!

By प्रेमलता पांडे

आज कई दिन बाद लिख रही हूँ क्योंकि काम बहुत था, घर में नहीं कार्यस्थल पर। थोड़ी साँस ली तो सोचा कुछ लिख डालूँ।
लिखना हमारी भूख है। हमारी संतुष्टि है, हमारी ज़रुरत है, हमारा काम है। हम लिखते हैं अपने लिए और दूसरो के लिए। जब हम दूसरों के लिए लिख रहे होते हैं तब भी हम अपने लिए ही लिख रहे होते हैं। ठीक इसका उलट भी।
पहले लोग जो स्थापित लेखक नहीं होते थे या जो व्यावसायिक लेखन नहीं करते थे, वो डायरियाँ लिखते थे, पत्र लिखते थे और पढ़ते थे। कार्यवश लेखन की बात अलग थी और है।
हमें याद है जब हम बहुत छोटे थे हमारे दूर के रिश्ते में दादाजी थे, वे एक बड़े व्यापारी थे। जिनके घरेलू पत्र भी जब हमारे यहाँ आते थे तो पिताजी हमसे दोबारा पढ़वाते थे कि देखो यह पत्र कितने सलीके से, कम शब्दों में और स्पष्ट लिखा है। कुछ भी बाक़ी नहीं है और न विस्तृत है न संक्षिप्त। यूँ पिताजी स्वयं पत्र बहुत अच्छा और लुभावना लिखते थे।
हमने बचपन का कुछ समाय पिता से दूर क़स्बे में दादेलाई घर में गुजारा। पिता हमसे दूर सर्विस में थे। पर क्या आजकल टेलीफॉन से बात होती हैं जो हम पिता से लिखित में दूर से ही वार्तालाप करते थे। हमारे पिता हमें प्रतिदिन पत्र लिखते थे जिसमें हमारे लिए पढ़ाई की टिप्स और ईमानदार जीवन जीने की कला के साथ-साथ हंसने के लिए भी कुछ न कुछ होता था। हम भी प्रतिदिन उन्हें जबाबी चिट्ठी लिखते थे। कभी-कभी तो कोई बात ऐसी होती थी कि हम उन्हें या वो हमें एक दिन में दोबार भी पत्र प्रेषित करते थे। हमें प्रतिदिन उनकी चिट्ठी की प्रतीक्षा होती थी।
सचमुच पत्र-लेखन एक कला है, ज़रुरी बात सही शब्दों के साथ दूसरे तक पूरी पहुँच जाए तो पत्र की सार्थकता है। कुछ भी लिखा हुआ निरर्थक नहीं होता चाहे वह सीधे-सीधे हमसे संबंधित हो या न हो।

Tags:

One Response to “सार और थोथा!”

  1. Anil Kant Says:

    apni kareebi baaton se roobroo karane ke liye shukriya

    Meri Kalm – Meri Abhivyakti

Leave a Reply