
हमने होली पर कई जगह पहले भी लिखा है। यहाँ और वहाँ। पर आज मन उड़ चला उस चौराहे पर जहाँ आजकल शाम को सारी छोटी-बड़ी लड़कियाँ मिलकर गुलाल से होली के चित्र बनाती थीं। शाम के चार बजे से ही एक दूसरे को बुलाते थे। डिब्बे में कई रंग के गुलालों की छोटी-छोटी डिब्बियाँ और सरकंडा, चम्मच तथा आटा -यह सब सामान फलौरादोज से ही तैयार हो जाता था। सरकंडे से लाइनें खींचीं जातीं और रंगों से चुटकी भरकर खाके को सजाया जाता। चम्मच, कटोरी से आकृतियाँ बनायी जातीं। क्या दिन थे- स्वच्छंद। न कोई वैर, न ईर्ष्या, न अभिमान, न छोटा और न बड़ा। सब मस्त मिलजुलकर मज़े करते।
सभी लड़कियाँ अपनी अलग-अलग होली बनातीं। बाद में उन पर कंटेरी के पीले फूलों की वर्षा करतीं।
पूर्णमाशी को होलिका दहन इसी जगह पर होता था।
March 5, 2009 at 04:09 |
होली को लेकर लगता है सबके पास यादें ही बची हैं, बधाई होली की
March 4, 2009 at 08:54 |
- विजय जी आभार!
- जी हाँ अनिलजी!
- महक! आपको ढ़ेरों शुभकामनाएँ और स्नेह!
March 4, 2009 at 00:19 |
sach sundar baat,aisibhi rangoli banate hai,holi ki pehle hi badhai de ke rakhun aapko.chitra khubsurat.
March 3, 2009 at 22:32 |
यादें …हाँ यादें …..यादें याद आती हैं …बातें भूल जाती हैं
March 3, 2009 at 22:24 |
प्रेम लता जी
नमस्कार
आज पहली बार आपके ब्लाग का भ्रमण किया अच्छा लगा
होली पर लिखी गई ये पोस्ट अच्छी लगी
- विजय