बहककर हथियार उठाते नहीं।

फूल तो खिल रहे हैं बाग़ में,
पर मुझे उनका सौंदर्य रिझाता नहीं,
चाँद की चाँदनी में लगे है तपिश,
तारों का जमघट लुभाता नहीं।

जो नज़ारे कभी लगते थे मनोहर ,
उनका दिखना भी सुहाता नहीं,
ये क्या हो गया है इंसान को,
उसे कोई और इंसान भाता नहीं।

कितनी नफ़रत हैं सब तरफ़,
कोई प्यार की हवा चलाता नहीं।
सब लगे हैं अपने ही स्वार्थ में,
कोई इनकी राह भटकाता नहीं।

सूझती है सभी को अपनी बात,
कोई दूसरे की बात बनाता नहीं।
ग़र न हो सिद्धी किसी राह से,
तो उस राह पर कोई जाता नहीं।

हो सके तो बदल लो अपनेआप को,
अपनी-अपनी से कोई कुछ पाता नहीं।
ज़िद्द है बस यह तुम्हारी कुछ देर की,
आतंक फैलाकर कोई कुछ पाता नहीं।

लड़ोगे, लड़ाओगे, मिटजाओगे,
पर फिर किसी से नाता नहीं।
जिनके इशारों पर नाचो हो तुम,
उनकी बदनीयत को तुमने जाना नहीं।

बड़े क़साई हैं वो बड़े बेरहम,
उनके दिल में प्यार का ठिकाना नहीं।
उकसाते हैं, भड़काते हैं, मिटाते हैं वो,
अपना मुँह किसी को दिखाते नहीं।
हो सके तो चल पड़ो प्यार की राह पर,
बहककर हथियार उठाते नहीं।

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5 Responses to “बहककर हथियार उठाते नहीं।”

  1. परमजीत बाली Says:

    बहुत बढिया रचना है।बधाई।

  2. mehek Says:

    bahut hi sundar rachana badhai,sahi pyar ki raah chale nafrat chode

  3. प्रेमलता पांडे Says:

    - आभार नीरजजी!
    - धन्यवाद हिमांशु!

  4. neeraj Says:

    जो नज़ारे कभी लगते थे मनोहर ,
    उनका दिखना भी सुहाता नहीं,
    ये क्या हो गया है इंसान को,
    उसे कोई और इंसान भाता नहीं।
    वाह…आज के हालात पर पर उम्दा रचना है आप की हर शब्द…हर पंक्ति मन की व्यथा को दर्शाती है…बहुत खूब…
    नीरज

  5. हिमांशु Says:

    अच्छी रचना . धन्यवाद.
    हिमांशु

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