घर से दो दिन के लिए ही क्यों न जाओ डर ही रहता है कब कौन कब्ज़ा करले! समय ही ऐसा है। सब को अपनी-अपनी पड़ी है। सब बस अपने बारे में सोचते हैं। चाहे किसी को परेशानी क्यों न हो हम तो बस अपनी परवाह करेंगे।
छज्जे में कबूतरों की सभा तो हमेशा ही होती रहती है। सभा ही क्यों लड़ाई भी होती रहती है, प्यार भी होता रहता है। फिर बाकी के काम कहाँ करें! अंडे कहाँ रखें और कहाँ सेऐं?
जब कबूतरी को कोई जगह न मिली तो गमले में तुलसी के पेड़ को दबोच कर घास लाकर अंडे रख दिए। करे भी तो क्या करे। सारी जगह तो हमने हथिया रखी हैं, बेचारे पक्षी जाएँ तो जाएँ कहाँ?
फुदकते-खेलते हर समय बीट करते रहते हैं और पंख छोड़ते रहते हैं। पर उनका क्या कसूर? उन्हें भी तो हक़ है, कुछ प्रोपर्टी उनकी भी है। यही सोच कर अपने ऊपर गुस्सा आता है, क्यों चिड़ते हैं हम इनसे?
ये मासूम बहुत ही अच्छे हैं। इन्हें प्यार और नफ़रत समझ आता है। जब माँ थी तो इन्हें रोज एक बड़े कटोरे में अनाज रखतीं थीं खाने के लिए और एक कटोरे में पानी। गर्मियों में वो पानी बदल-बदल कर ठंडा करती रहतीं थीं।
ये भी गर्म पानी नहीं पीते थे। अगर पानी धूप से गर्म हो जाए या वो भूल जाएँ तो झट से उनके कमरे में जाकर उनके पलंग के किनारे बैठ जाते थे और माँ -” आ रही हूँ मरे! तुझे भी फीरिज का पानी चहिए! ठैर! अभी डाल रई हूँ” कहकर, फ़्रिज़ से बोतल निकाल कर पानी बदल देती। कबूतर जो मुंडेर पर पहुँचकर ताक रहा होता उनके मुड़ते ही कटोरे पर लपकता और पानी पीता। जब कटोरे में पानी न हो तो चोंच से बजा-बजा कर उसके खालीपन को जता देता ।
अब जबतक इन अंडों में से बच्चे निकलकर बड़े न हो जाएँगे कबूतरी यही बैठी रहेगी जब थोड़ी देर के लिए कबूतर आएगा तब उड़ कर जाएगी और जल्दी वापिस आ जाएगी। इसके पास ही दाने और पानी रखूंगी वरना कमज़ोर हो जाएगी और तो मै उसका क्या ध्यान रख सकती हूँ। डर है तो जल्लाद कौओं का ही है। ज़रा आँख बची तो कहीं अंडे न फोड़ दें।
October 6, 2008 at 22:44 |
bahut pyare kabutar hai,kya ande ubkar bachhe nikal aae hai ab tak a nahi? maa ka dialog firig ka pani bahut pasand aaya.
thanks mehek!
October 5, 2008 at 20:08 |
ध्यान रखिये…कौवा बड़ा बदमाश होता है, उसे भगाते रहिये. शुभकामनाऐं.