ठंड न जाए,
बादल भी छाए ,
हवा हि सताए,
तो क्या बसंत है?
पतझड़ बहारें,
सूखी हैं डालें,
पंछी न गावें, तो क्या बसंत है?
मौसम भ्रमाया,
मन डरपाया,
कैसी यह माया,
कैसा बसंत है?
खिलते थे फूल,
उड़ती थी धूल,
हरियातीं थी मूल,
कहाता-बसंत है!
न कच्ची ज़मीनें
न पेड़ों की लकीरें,
कंकरीट की झीलें,
कैसे बसंत है?
बिल्डिंग उगाओ,
पीला पुतवाओ,
पंछी खुदवाओ,
वोही बसंत है?
जागो तो अच्छा,
सोचो तो बच्चा,
हो तरु-भक्त सच्चा,
तभी बसंत है।
Tags: trees
February 10, 2008 at 21:25 |
sahi hai phir kaisa basant,sundar kavita
Ans- thanks for comment.