मार्गदर्शन
बच्चों को मॉनीटर बनना बहुत पसंद होता है अधिकतर बच्चे पढ़ने से ज़्यादा ग्रुपलीडर और हेडगर्ल/बॉय बनने की इच्छा रखते हैं अब ये अलग बात है कि उनसे वह जिम्मेवारी ठीक से वहन की जाए या नहीं। आगे रहने की लालसा सबके मन में छिपी रहती है। पर सब कुछ बनाने वाले की अक़्ल और अनुकरण करने वाले की अक़्ल पर निर्भर होता है।
आम जीवन में भी लोग प्रमुख/मार्गदर्शक बनने की इच्छा रखते हैं। मार्गदर्शन करने से पहले अगर स्वयं उस मार्ग पर चले हों तो वहाँ के बारे में सैद्धांतिक और व्यवहारिक पक्षों के अलावा हानि-लाभ का ब्यौरा भी पता होता है, पर जब बिना देखे ही दिशा-निर्देशन होने लगता है तो पूर्ण शुद्धता की इच्छा रखने में शंका होने लगती है और जब निर्देशन ही खोट भरा हो तो फिर उतने लाभकारी परिणाम किसी भी कार्य के कैसे मिल सकते हैं? जितने मिलने चाहिए। आज जीवन में व्यक्तिगत लाभ के कारण ही ऐसे कई मार्गदर्शक अपनी भूमिका निभा रहे हैं जो क्षेत्र विशेष के लिए लाभ की बजाय हानिकारक हो सकती है। हमें विस्तार से समझ कर ही किसी का अनुकरण या मार्गदर्शन करना चाहिए, वरना दुविधा के अलावा कुछ प्राप्प्त नहीं हो सकता है।
January 6, 2008 at 11:36 pm
बहुत खूब…. गागर में सागर भर दिया.. जो न समझे वो अनाड़ी हैं…
उ०- धन्यवाद।