तेज-तेज
गर्मी!!!
तेज-तेज गरमी पड़ती,
आइसक्रीम ही अच्छी लगती।
तेज धूप से सब घबराएँ,
पोंछ पसीना सब थक जाएँ।
बाहर न खेलन जाते,
घर में ही सब उधम मचाते।
कई बार नल सूख जाते,
ठीक से नहा न पाते।
हाय क्यों ये गर्मी आयी,
फूल-कलियाँ सब मुरझायीं।
गाँव में तो सब मुस्काते,
पेड़ों के नीचे सो जाते।
शहरों में भी पेड़ लगाओ,
इस गरमी को दूर हटाओ।
वर्षा!!!
बादल आए, बादल आए,
सब के सब ऊपर मंडराये।
अब हो! तब हो! कब हो! वर्षा,
बूंद-बूंद को मन है तरसा।
तभी अचानक बिजली चमकी,
ज्यों गुस्से में हो अकड़ी।
बादलों को गुस्सा आया,
खूब ज़ोर से शोर मचाया।
तेज-तेज बूंदे बरसीं,
चलती रस्सी हो जल की।
गलियाँ भर गयीं, नदियाँ बन गयीं,
बहते-बहते घर में मुड़ गयीं।
भीग-भीग कर कूदें -फाँदें,
एक-दूसरे को धक्का दें।
लुढ़कें-पुढ़कें और उठ जाएँ,
कागज की तो नाव तैराएँ।
सारे में तो पानी-पानी,
चाहे जो करो मनमानी।
September 11, 2007 at 9:02 pm
तभी अचानक बिजली चमकी,
ज्यों गुस्से में हो अकड़ी।
बादलों को गुस्सा आया,
खूब ज़ोर से शोर मचाया।
आपकी कविता के इस अंश में सफल मानवीकरण देखकर मुझे महान् कवि जयशंकर प्रसाद का छायावाद याद आ गया।
September 14, 2007 at 10:13 pm
Oh! too much!!!
thanks for comment.