ध्रुव

ध्रुव कि कहानी के माध्यम से कितना गहरा ज्ञान और शिक्षा दी गयी थी  - जान लेते हैं। 

उत्तानपाद अर्थात सीधा चलने वाला राजा जिसके दो रानियाँ थीं- सुरुचि और सुनीति।  जो ज़्यादा रुचिकर हो वह सुरुचि और जो  ज़्यादा नीति की बात बताए वह  सुनीति। सभी को रुचि के अनुसार ही सभी कुछ अच्छा लगता है, नीति की कठोर बातें तो कम ही भाती हैं। राजा भी सुनीति की अपेक्षा सुरुचि को ही अधिक चाहता था। सुरुचि ने उत्तम  पैदा किया तो सुनीति जो स्थिरता को जन्म देती है,  से ध्रुव अर्थात अटलता को जन्म मिला।  जब ध्रुव राजा की गोद में बैठने के लिए उत्सुक था तब राजा उसे गोद में बैठाने ही जा रहा था,  अर्थात वह नीति के अनुसार अटलता/स्थिरता अपनाने ही वाला था  तो सुरुचि मन पर हावी हो गयी और उत्तानपाद  ध्रुव को न बैठा पाया।  सुरुचि ने उसे अपनी कोख़ से जन्म लेने की बात कही, अर्थात स्थिरता या अटलता भी तभी अच्छी है जब  रुचिकर हो। सुनीति जानती थी कि राजा सुरुचि से ही निर्णय लेता है नीति को तो अपनी साथी क्या दासी भी नहीं समझता है- 

“सत्यं सुरुच्याभिहितं भवान्मे

यद दुर्भगाया  उदरे गृहीतः।

स्तन्येन वृद्धश्च विलज्जते यां

भार्येति वा वोढुमिड्स्पतिर्माम।” 

हमें जीवन में रुचि के साथ-साथ नीति को भी ध्यान में रखना चाहिए।

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