गर्म हाइकू

By प्रेमलता पांडे

गुलमोहर
दहके संग लेके!
अमलतास।

विघ्नबेलिया
चहुँ ओर बहके,
क्या तरुणाई!

अरी कनेर!
क्यों न सकुचायी?
क्या मन आई

चंपा-चमेली
सहेली या भनेली,
ओह! ठिठोली!

बेला-री-बेला!
चार दिन का मेला,
कैसा झमेला?

रे गुड़हल!
न इठला यूँ अब,
दहके मन।

Leave a Reply