पुराणों में शुक्र को भृगु ऋषि की संतान कहा गया है। ये वही भृगु ऋषि हैं जिन्होंने भगवान विष्णु के शयन कक्ष में जाकर उनके लात मारी थी-
” कहा रहीम हरि को घटौ, जो भृगु मारी लात।”
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार शुक्र ग्रह की स्थिति अभिजित के अट्ठाइस नक्षत्रों से दो लाख योजन ऊपर कही गयी है। यह सूर्य के कभी आगे, कभी पीछे और कभी साथ-साथ चलता है। यह वर्षा कारक ग्रह है इसलिए सदा अनुकूल रहता है। ऐसा अनुमान है कि यह वर्षा रोकने वाले ग्रहों को शांत कर देता है-
“तत उपरिष्टादुशनाद्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः पश्चात्सहैव वार्कस्य शैघ्रयमान्द्यसाम्याभिर्गतिभिरर्कवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल एवं प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्ट्म्भग्रहोपशमनः॥”
ज्योतिष में शुक्र को सौन्दर्य और कला के साथ-साथ काम-वासना का ग्रह भी कहा गया है। इसकी दैनिक गति ७६ कला, ७ विकला है। यह एक राशि पर लगभग ४३/४४ दिन ही रहता है। वृष और तुला का तो यह स्वामी है ही, मीन राशि में यह सर्वाधिक फलित होता है पर कन्या और मेष में यह प्रभावहीन समझा गया है। चन्द्र-सूर्य इसके विरोधी हैं। गुरु को यह आदर करता है पर गुरु इससे खुश नहीं । मंगल से यह सम है तो शनि, राहू और केतु इसके मित्र हैं। जन्मकुंडली में शुक्र की अच्छी और शक्तिशाली स्थिति महान और यशस्वी कला-निष्णात बना देती है तो बुरी और शक्तिशाली स्थिति व्यसनी! पूरी तरह खराब स्थिति घृणित-रोग की कारक भी कही गयी है। अम्लीय स्वाद का स्वामी शुक्र श्वेत रंग का कहा गया है, पर इसके प्रतीक रंग बैंगनी और फ़िरोज़ी कहे गए हैं।
February 28, 2008 at 16:20 |
adhura lekh hai….
June 9, 2007 at 09:00 |
नमस्कार! आपके इस पन्ने को पढ़कर थोड़ा भारी भारी सा लग रहा है| कारण यह है की हिंदी, संस्कृत और ज्योतिष-शास्त्र का ज्ञान इतना अच्छा नहीं है| आशा करता हूँ की आप इन पन्नों पर कुछ ऐसे लेख भी लिखें जो हमें इस शास्त्र से अवगत कराएँ|
धन्यवाद
सुमन
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