गुरु-बृहस्पति (ज्योतिष-१६)

By प्रेमलता पांडे

श्रीमद्भागवतपुराण में  बृहस्पति को ऋषिअंगिरा और श्रद्धा  से उत्पन्न कहा गया है-

“तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे। 

उतथ्यो भगवान साक्षाद्ब्रह्मिष्ठश्च बृहस्पति॥”

 और इसे मंगल से दो लाख योजन ऊपर बताया गया है। यदि यह वक्रगति से न  चले  तो एक-एक राशि को एक-एक वर्ष में भोगते हैं-

 तत उपरिष्टाद द्विलक्षयोजनान्तरगतो भगवान बृहस्पतिरेकैकस्मिन राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं चरति   यदि न वक्रः स्यात्प्रायेणानुकूलो ब्राह्मणकुलस्य॥”    इसकी दैनिक-गति १४ कला, ४६ विकला है। यह संपूर्ण राशियों में घूमने में ११ वर्ष, १० मास, १५ दिवस, ३६ घटी और ८ पल लगाता है। गुरु काल-पुरुष का ज्ञान है। विद्वानों की कुंडली में गुरु अत्यधिक सुदृढ़ स्थिति में माना गया है। सूर्य, मंगल और चंद्रमा के साथ यह अत्यधिक प्रभावशाली कहा गया है। बुध और शुक्र के साथ  प्रभावहीन। शनि और राहू  के साथ विरोधभाषी। कर्क राशि  में यह अनुकूल कहा गया है तो मकर राशि में यह प्रतिकूल। पीला रंग इसका प्रतीक रंग है। गुरु अन्य ग्रहों के प्रभाव पर अपना प्रभाव रखने वाला कहा गया है। गुरु जहाँ बैठता है उसी भाव के अनुसार बहुत गहरा फलदाता कहा गया है।  

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