बुध (ज्योतिष-१५)

By प्रेमलता पांडे

श्रीमद्भागवतपुराण में बुध को  चंद्रमा  और रोहिणी का पुत्र बताया गया है।  वैवस्वत मनु की पुत्री इला इनकी पत्नी कही गयी है। इनका बेटा पुरुरवा था  जिसने  सौ से भी अधिक अश्वमेघयज्ञ किए थे। इसकी स्थिति शुक्र से दो लाख योजन ऊपर है। यह प्रायः मंगलकारी ही है। किंतु जब सूर्य की गति का उल्ल्घंन करके चलता है तो तब बहुत अधिक भयावह मौसम -  आँधी, बादल और सूखे की सूचना देता है-

” उशनसा बुधो   व्याख्यातस्तत उपरिष्टाद  द्विलक्षयोजनतो बुधः सोमसुत  उपलभ्यमानः प्रायेण शुभकृद्यदार्काद्  व्यतिरिच्येत तदातिवाताभ्रप्रायानावृष्ट्यादिभयमाशंसते॥”                             

इसकी दैनिक गति २४५ कलाऔर ३२विकला बतायी गयी है। इसे संपूर्ण राशियों में घूमने में ३१६ दिन, १५ घटी, ३१ पल और ३० विपल का समय बताया गया है। एक राशि में यह लगभग एक मास तक  विचरण  करता है।  बुध को कालपुरुष की वाणी कहा गया है। यह वाणी, विद्या और  बुद्धि का प्रतीक माना गया है।  गणितज्ञों की जन्मकुंडली में बुध की अच्छी और शक्तिशाली स्थिति देखी गयी है।    

 हरा  रंग प्रधान यह   ग्रह अन्य किसी शक्तिशाली ग्रह के साथ बैठने पर उसके अनुसार ही  फल देने वाला कहा गया है। सूर्य के साथ कर्म भाव या  आयभाव में बैठने पर उच्चतम व्यवसायी या लेखाज्ञानी बनाता है। इसके अलावा कूतनीतिज्ञों, वक़ीलों, ज्योतिषियों, लेखकों, तर्कशास्त्रियों तथा वक्ता और अध्यापकों की कुंडली  में बुध सुदृढ़ स्थिति में देखे गए  हैं। समग्र रुप में बुध ज्ञान के प्रकाशक हैं।    बुध को  मुख, नासिका, वाणी, स्नायु, जिह्वा, तालु, नाड़ी-कंपन, रक्ताल्पता आदि का भी प्रतिनिधि भी  कहा गया है। 

बुध को बालक की विशेषताओं वाला ग्रह कहा गया है।                                                                                                                                       

 

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