मंगल (ज्योतिष-१४)

By प्रेमलता पांडे

   श्रीमद्भागवत पुराण में मंगल को  बुध  से दो लाख योजन ऊपर बताया गया है। इसके अनुसार मंगल यदि वक्रगति से न चले तो एक-एक राशि को तीन-तीन पक्ष में भोगता हुआ बारहों  राशियों को पार कर लेता है-

“अत ऊर्ध्वमङ्गारकोऽपि योजनलक्षद्वितय उपलभ्यमानस्त्रिभिस्त्रिभिः पक्षैरेकैकशो राशीन्द्वादशानुभुङ्क्ते यदि न वक्रेणाभिवर्तते  प्रायेणाशुभग्रहोऽघशंसः॥”

ज्योतिष   में इसे भूमिसुत कहा गया है इसीलिए इसका नाम भौम पड़ा। इसकी दैनिक गति ४६ कला,१८ विकला बतायी गयी है। यह सभी राशियों में घूमने में ६८६ दिन,  ५८ घटि, ९ पल,  और १८विपल लगाता है। इसे काल-पुरुष का पराक्रम या साहस कहा गया है। जन्मपत्री में इससे साहस, उत्तेजना और रक्त की तरह लाल रंग संबंधी विषयों का फलित करने की बात कही गयी है। भौम होने के कारण इसकी स्थिति से ज़मीन ज़ायदाद का भी पता चलता है ऐसा  माना गया है। यह मकर राशि में सर्वाधिक प्रभावशाली माना गया है।   यदि लग्न-कुंडली (चार्ट) में दूसरे,  चौथे,  सातवें,  आठवें और बारहवें भाव में मंगल दृष्टिगोचर हो तो वह  व्यक्ति मंगली कहा गया है। यहाँ यह बड़ी स्थूल बात मंगली होने के विषय में लिखी है। भाव- वर्णन के समय अधिक स्पष्टता रहेगी। लाल रंग इसका प्रतीक है। ऊर्जावान ग्रह – सूर्य- चंद्रमा के साथ और शनि के साथ मिलकर यह अधिक प्रभावशाली होता है, गुरु के साथ तटस्थ, परंतु शुक्र और बुध के साथ  प्रभावित होकर अपनी प्रभावशीलता बिगाड़ देता है ।  विशेष बात यह है कि चंद्रमा के साथ तो प्रभावशील कहा गया है, परंतु चंद्र-राशि कर्क में यह अच्छा नहीं रहता।

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