पहली लड़ाई
हम अपनी आजादी के लिए लड़ी गयी पहली लड़ाई को याद कर रहे हैं - उसकी डेढ़सौवीं बरसी पर। उन वीरों और बलिदानियों की शौर्यगाथा गा रहे हैं जिन्होंने इस लड़ाई में अपने को कुर्बान कर दिया। इतिहास गवाह है कि यह लड़ाई हर मायने में देश प्रेम का भाव भरने में सहायक थी और आज भी है। इससे पहले तक सभी राजा अपनी-अपनी छोटी-छोटी रियासतों में राज करते थे और आपस में भी झगड़ते रहते थे। अँगरेजों ने जो अत्याचार मचाया तो सभी पास-पास आगए। अँगरेजों के खिलाफ एक जुट हो गए जिससे आज के अखण्ड भारत का रुप बना। अँगरेज बाहरी थे इसलिए सारी जनता जाति, धर्म. संप्रदाय और ग़रीब रईस का अंतर भुलाते हुए मिलकर शामिल हुयी थी। अँगरेजों से बग़ावत करना ही सबका उद्देश्य था यही भाव आगे चलकर आजादी के लिए अहिंसात्मक विद्रोहों में भी काम आया था। कहने को कोई कुछ भी कहे पर यह विद्रोह ही पहली जंगेआज़ादी थी। सिपाही ही नहीं बल्कि आम आदमी भी इसमें शामिल था क्योंकि भावनाओं को कुंठित करके बाहर से आया शासक अपनी दमन और शोषण की नीति चला रहा था। इस लड़ाई ने अँगरेजों को सोचने को मजबूर किया था और नीतियों में बदलाव भी किए थे। यह लड़ाई कमजोर की जबरन घुस आए ताक़तवर से थी जो कब्जा जमाए बैठा था और भूल गया था कि घर कमजोर का ही था। यह लड़ाई मात्र वीरता का स्मरण करने के लिए ही नहीं है बलिक कुछ सीख लेने के लिए भी है। यदि हम आपस में धर्म, जाति, संप्रदाय और आर्थिक अंतर में बंटे रहेगें तो अपना ही नुकसान करेगें। आंतरिक शांति और सदभावना से देश को ताकत मिलती है और समृद्धि की राह आसान हो जाती है। हमारे देश की विभिन्नता में एकता ही अद्वितीय ख़ूबसूरती है। इसको बनाए रखकर ही हम सुखी रह सकते हैं।
May 15, 2007 at 7:24 pm
Saare Bhuvan mein aary jan jiski utaarein aarti
bhavaan bhaart varsh mein goonje hamari bhaarti