श्रमिक

By प्रेमलता पांडे

पसीना बहा,

अट्टालिका उठायीं,

मालिक कौन?  

श्रम पड़ा है,

श्रमजीवी खड़ा है,

मशीनी युग! 

 

समान जन,

मानवता की  रस्म,

नवीन तंत्र! 

 

जय श्रमिक!!!

डर मत तनिक!

स्वयं मालिक।  

श्रम पूजा है,

पुजारी तू बड़ा है!

निराश न हो।   

दूरियाँ मिटीं,

श्रमिक परेशान!

हाथ बेकार?  

श्रमिक सब!

परस्पर संबंध!

बड़ा बाज़ार।   

वैश्विकजन,

क्लांत भ्रांत सा मन,

नवीनश्रम।   

One Response to “श्रमिक”

  1. gaurav Says:

    jay shramik.

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