१
पसीना बहा,
अट्टालिका उठायीं,
मालिक कौन?
२
श्रम पड़ा है,
श्रमजीवी खड़ा है,
मशीनी युग!
३
समान जन,
मानवता की रस्म,
नवीन तंत्र!
४
जय श्रमिक!!!
डर मत तनिक!
स्वयं मालिक।
५
श्रम पूजा है,
पुजारी तू बड़ा है!
निराश न हो।
६
दूरियाँ मिटीं,
श्रमिक परेशान!
हाथ बेकार?
७
श्रमिक सब!
परस्पर संबंध!
बड़ा बाज़ार।
८
वैश्विकजन,
क्लांत भ्रांत सा मन,
नवीनश्रम।
May 1, 2007 at 20:14 |
jay shramik.