समय को मापने और बताने के लिए आज तो अनेक प्रकार की घड़ियाँ हैं जो सूक्ष्मतम विभाजन करके गणना कर देती हैं। परंतु इन सब का आधार तो प्राचीन ग्रंथ ही हैं।
प्रस्तुत है श्रीमद्भागवतपुराण में वर्णित काल-विभाग :
श्रीमद्भागवतपुराण में परमाणु के विषय में स्पष्ट लिखा है:
“चरमःसद्विशेषाणमनेकोऽसंयुतः सदा।
परमाणुः स विज्ञेयो नृणामैक्यभ्रमो यतः॥”
जिसका और विभाजन नहीं हो सकता तथा जो कार्यरुप में प्राप्त नहीं हुआ है और जिसका अन्य परमाणुओं के साथ संयोग नहीं हुआ है उसे परमाणु कहते हैं। भ्रमवश ही अनेक परमाणुओं के समुदाय में एक अवयव की प्रतीति होती है।
यह परमाणु परम महान और निरंतर है-
“ सत एव पदार्थस्य स्वरुपावस्थितस्य यत।
कैवल्यं परम महानविशैषो निरंतरः॥”
इसी सादृश्य काल की सूक्ष्मता और स्थूलता का अनुमान लगाया जा सकता है-
“एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थूल्ये च सत्तम।
संस्थान भुक्त्या भगवानव्यक्तव्यक्त भुग्विभुः॥”
यह कल प्रपंच की परमाणु जैसी सूक्ष्म अवस्था में व्याप्त रहता है और सृष्टि से लेकर प्रलयपर्यंत उसकी सभी अवस्थाओं का भोग करता है वही परम महान है!
अन्य विभाजन इसप्रकार हैं :-
- दो परमाणु = एक अणु,
- तीन अणु = एक त्रसरेणु।
(त्रसरेणु- जो झरोखे में से होकर आयी हुई सूर्य की किरणों के प्रकाश में उड़ता देखा जाता है)।
- तीन त्रसरेणु को पार करने में सूर्य को जितना समय लगता है उसे त्रुटि कहते हैं।
- त्रुटि का सौ गुना= वेध,
- तीन वेध = एक लव,
- तीन लव = एक निमेष,
- तीन निमेष = एक क्षण,
- पाँच क्षण = एक काष्ठा,
- पंद्रह काष्ठा = एक लघु,
- पंद्रह लघु = एक नाडिका(दण्ड),
- दो नाडिका = एक मुहूर्त,
- छः या सात नाडिका = एक प्रहर (दिन और रात के संधि समय के दो मुहूर्तों को छोड़कर)प्रहर को ही यम कहते हैं। यह ही श्रीमद्भागवतके अनुसार मनुष्य के दिन या रात का चौथा भाग है।
नाडिका के लिए यह भी लिखा है –
“द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः।
स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत्प्रस्थजल्प्लुप्तम॥
अर्थात छः पल ताँबे का एक ऐसा बरतन बनाया जाए जिसमें एक प्रस्थ जल आ सके और चार माशे सोने की चार अँगुली लंबी सलाई बनवाकर उसके द्वारा उस बरतन के तल में छेद करके उसे जल में छोड़ दिया जाए। जितने समय में बरतन में जल भर जाए और वह जल में डूब जाए उतने समय को एक नाडिका कहते हैं।
अप्रैल 28, 2007 at 20:28 |
बहुत ही ज्ञानवर्धक है।