वसुधा को नमन
कल पृथ्वी-दिवस है। यूँ तो हाल के कुछ वर्षों में अनेक शीर्षकवाले दिन सुशोभित होते रहते हैं परंतु पृथ्वी दिवस का महत्त्व बिल्कुल अलग है। हम अपनी गौरवगाथा तो हमेशा ही गाते चले आये हैं, सदा अपने को सर्वश्रेष्ठप्राणी भी समझते रहे हैं, पर किसके सामने? हमेशा मियांमिट्ठु ही तो होते हैं ! कौन है जो बताए कि हमने अपने अद्वितीय गुण और विकसितमस्तिष्क के द्वारा हर सजीव का शोषण किया है। पृथ्वी के हर कण का प्रयोग केवल अपने लिए किया है। हमने पृथ्वी से एक निर्दयी संतान की भाँति व्यवहार किया है जो सारी संपत्ति हड़पने के बाद उसे उसके हाल पर छोड़कर कभी भी अपनी गलती का एहसास नहीं करता। सर्व श्रेष्ठ प्राणी को यह शोभा नहीं देता! हमने पृथ्वी का दोहन करके उसे उसके हाल पर छोड़ दिया है! क्या यही है हमारी विकसित मानसिकता? सुख और चैन की अंधी दौड में हम भूलते रहे हैं कि हम घर फूँक तमाशा देख रहे हैं। हम तो ऐशोआराम का जीवन जी रहे हैं पर हमारी आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? इस प्रश्न के सामने हमारी स्थिति उस शराबीजुआरी व्यसनी पिता जैसी है जो बाप का माल उड़ा देता है और अपना कुछ नहीं छोड़ता, उसके बच्चे दर-दर भटकते हैं।
विद्वानों की उपाधि से विभूषित हम मानव स्वयं ही भर्त्सना के योग्य हैं जिंहोंने सुंदर रत्नगर्भा पयोधिनी वसुंधरा को विकलांग कर छोड़ा है?
बड़ी-बड़ी बातें करने वाले हम मानव अपने अंदर की पाशविकता को समाप्त नहीं कर पाए हैं बल्किबड़ी चतुराई से उसे छिपा जाते हैं! हम त्याग की मूर्ति कहे जाने वाले प्राणियों ने जितना त्याज्य कार्य किया है उतना शायद किसी और सजीव ( जंतु और वनस्पति) ने नहीं।
आज हमने अपनी बेवकूफियों से पृथ्वी की जो हालत कर दी है उसके लिए हम सभी को प्रायश्चित करना होगा।यदि आज भी हम अपनी ग़लतियों का अहसास करते हुए उनके संशोधन में लग जाए तो शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ छोड़ जाए वरना वे पृथ्वी की सुंदरता और समृद्धि के विषय में बस चिट्ठों में ही पढ़ और देख पाएँगे। इसके लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर योगदान देना चाहिए। अब बहुत देरहो चुकी है यदि अबभी नहीं चेते तो फिर क्या चेत पाएँगें?
धरती को दोनों प्रकार के लोगों ने नुकसान पहुँचाया है। अमीरों ने अपने ऐशोआराम के लिए भूसंपदा का बिना सोचेसमझे कि अंत क्या होगा? दुरुपयोग किया है, तो ग़रीबों ने भूखे पेट की खातिर! परंतु भूखे की बात तो समझ आती है पर अमीरों के चोचलों से जो वसुधा बीमार घायल या यों कहे अंगभंग हुई है उससब पर तो एक दम रोक लगनी चाहिए, पर ये तो सब बड़ी-बड़ी बातें हैं हम तो अपने स्तर पर भी सभी साधारण लोग कुछ कर सकते हैं-
१. आज से ही पॉलीथीन का प्रयोग बंद कर देना चाहिए। कपड़े के सिले थैले जो ग़रीबों को रोजगार दे सकते हैं, का प्रयोग फ़ैशन के रुप में युवा करें तो एक दम बद्लाव आ जाए।
२. घर की सफाई पर सब ध्यान देते हैं, पर घर से बाहर की सफाई का भी ध्यान रखें और दूसरों को भी प्रेरणा दें तो समस्या हल हो सकती है।
३. सभी लोग अपने-अपने क्षेत्र में सप्ताह में एक बार श्रमदान करें और वृक्षरोपण और उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी को वीकएंड के कार्यक्रमों में शामिल करें।
४. गृहणियाँ चाहें तो क्या नहीं कर सकती हैं। वह आसपास में सफाई और हरियाली बढ़ाने में सर्वाधिक कारगर भूमिका अदा कर सकतीं है।
५. कार, स्कूटर और मोटर साइकिल जैसे ईंधन खर्च करने वाले वाहनों का प्रयोग शान के लिए नहीं बलिक ज़रुरी काम के लिए हो चाहिए। उच्च वर्ग को चाहिए कि वह आदर्श प्रस्तुत करे। युवा जो सपनों में जीते हैं अपने सामने प्रतिष्ठित लोगों की आदतों का अनुकरण बहुत ज़ल्दी कर लेते हैं उनके लिए ये उपाय कारगर हो सकते हैं।
६. साइकिल का प्रयोग खादी की तरह फ़ैशन बनना चाहिए ताकि प्राकृतिक ईधन खर्च करने वाले वाहन का प्रयोग रोका जा सके।
७. यात्रा पर जाते समय सफाई और स्वच्छता के साथ-साथ अनुशासन का पालन करना चाहिए। मैं जब भी तीर्थस्थलों जैसे बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा पर गयी हूँ मैने देखा है कि लोग पुण्य की बजाय वहाँ पाप करके आते हैं। केदारनाथ जाते समय गौरीकुंड के पड़ाव पर तो मेरा मन तड़प उठा। जब विश्रामस्थल के छ्ज्जे से मटकती-मचलती किल्कारियाँ भरती मंदाकनी नदी का सौंदर्य देखा तो मन को लगा कि यही है असली देवी का रुप! परंतु दूसरे ही क्षण जब उसके किनारों पर दृष्टि डाली तो मन रो गया!!! प्लास्टिक की खाली (पानी की) बोतलें और पॉलीथीन का जमावड़ा लगा हुआ था। मैंने जब होटल के प्रबंधक से बातचीत की तो उसने सरकार की दुहाई दे दी। लेकिन मेरी नज़र में दोषी तीर्थयात्री थे, जिन्होंने गंदगी फैलायी हुई थी।
८. बिजली, पानी और गैस(ईंधन) का प्रयोग बहुत ही अनुशासित रुप से करना चाहिए। रात में होने वाले समारोहों और सभाओं का प्रचलन समाप्त करना चाहिए।
९. कागज का दुरुयोग भी हमारी हरियाली को नष्ट कर रहा है। कागज़ का प्रयोग मितव्ययता से करने की आदत डालनी चाहिए।
१०. वृक्षों की सुरक्षा को भी मानव को अपनी सुरक्षा की तरह ही समझनी चाहिए। पृथ्वी हम सभी की है। किसी एक की नहीं ! सब को मिलकर इसे पुनः समृद्ध बनाना है। छोटे-बड़े, पढ़े-लिखे, सभी जाति और धर्म-संप्रदाय की माँ यह पृथ्वी ही है। यह न होती तो हम कहाँ होते तो आओ मिलकर इसकी सेवा करें और अपना तथा अपने पीछे आने वाली पीढ़ियों का हक उन्हें दे दें।
April 24, 2007 at 12:36 pm
gyanvardhk hai.
April 24, 2007 at 1:41 pm
bilkul sahi likha hai. dharati to sabhi ki hai. phir ek hi kyon kabja kare rahata hai. miljul kar hi rahana chahiye