योग
योग दो प्रकार के माने गए हैं -
(१) विष्कंभादि योग और (२) आनंदादि योग।
विष्कंभादियोग - सूर्य और चंद्रमा की गति के योग करने से विष्कंभादि योग बनते है, इनकी चर्चा ‘पंचांग’ के अंतर्गत हो चुकी है। सूर्य और चंद्रमा के स्पष्ट स्थानों (अंशों) को जोड़कर उनकी कलाएं बनाकर ( काल गणना पहले लिखी जा चुकी है) उसमें ८०० का भाग देने से गत योगज्ञात हो जाते हैं जो शेष बचता है उससे पता चलता है वर्तमान योग की कितनी कलाएँ बीत चुकी हैं।शेष को ८०० में से घटाने से वर्तमान योग की गम्य कलाएँ पता चल जाती हैं।इन गत या गम्य कलाओंको ६० से गुणा करके सूर्य और चंद्रमा कीस्पष्ट दैनिक गति के योग से भाग देने पर वर्तमान योग की गत और गम्य घटियाँ प्राप्त हो जाती हैं। स्पष्टतः जब एक नक्षत्र के आरंभ से सूर्य और चंद्रमा दोनों मिलकर ८०० कलाएं पार कर लें तब एक योग बीता हुआ माना जाएगा।
आनंदादि योग- इनकी संख्या अटठाइस है।
१. आनंद, २.कालदण्ड, ३. धूम्र,४. धाता, ५. सौम्य, ६.ध्वांक्ष,७. केतु, ८. श्रीवत्स,९. वज्र, १०. मुद्गर,११. छत्र, १२. मित्र,१३. मानस, १४. पद्म,१५. लुम्ब १६. उत्पात, १७. मृत्यु, १८. काण, १९. सिद्धी, २०. शुभ, २१. अमृत, २२. मुसल, २३. गद, २४. मातंग,२५. रक्ष, २६. चर, २७. सुस्थिर, २८. प्रबर्धमान।
इन्हें जानने के लिए रविवार को अश्वनि से गिनें, सोमवार को मृगशिरा से , मंगलवार को आश्लेषासे, बुधवार को हस्त से, गुरुवार को अनुराधा से, शुक्रवार को उत्ताराषाढ़ा से और शनिवार को शतभिषा से गिनना चाहिए। रविवार को अश्वनि है तो आनंदयोग और भरणी है तो कालदंड होगा , इसीप्रकार गणना करनी चाहिए।
March 28, 2009 at 09:14 |
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