दवाई
चारों ओर शोर है,
डर का बहुत ज़ोर है,
हर कोई है सहमा सा,
कह नहीं पाता जो कहना था।
आदमी बहुत डर रहा है,
न जाने किस-किस से मर रहा है।
कभी धर्म का भेद,
कभी जाति का छेद,
कभी वैभव का खेल,
कभी समाज की जेल।
सभी तो दर्द दिलाते हैं,
तिलतिल तड़पाते हैं।
लाइलाज होने से पहले दवाई करनी है
जड़ से बुराई हटनी है।
नफरत को दो ज्वलनशील,
धर्म को दो मानवता की खील।
समाज की नयी इमारत बनाओ,
जाति का अंधकार मिटाकर
समता की ज्योति जलाओ।
वैभव के अंतर को दो दान झोली,
फिर लगाओ समानता की बोली।
शोर तो अब भी होगा,
पर भाव तो नया होगा।
March 28, 2007 at 8:19 pm
वाह
April 20, 2007 at 4:59 pm
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