होली-एक दृष्टिकोण

   त्योहार प्रतीक हैं कला के, संस्कृति के, वैज्ञानिक विचारधारा के और  सामाजिक परम्पराओं के। समग्र रुप से कहें तो उत्सव या त्योहार हमारे सामाजिक अनुशासन का दर्पण हैं। सामाजिक विचार के बिना तो आज हम इस रुप में ना होते, समाज है तो भिन्न्ता है, भिन्न्ता है तो एकता  है  जो जोड़ती है (बिना भिन्नता के जोड़ कहां होता?) और यही एकता  हमें नियमों और संस्कारों में बांधती है, परम्पराओं का निर्माण कराती है रिवाज़ों के धागों से सामाजिकता की ओर खींचती है  जिसके  परिणामस्वरुप  त्योहारों का/ उत्सवों का रुप सामने आता है।

पंचांग के अनुसार चैत्र से प्रारम्भ वर्ष का फाल्गुन अंतिम मास है जो जाते-जाते होली के उत्सव के रुप में प्यार के रंग में रंगे रहने की शिक्षा दे जाता है। होली को   रंगों का  त्योहार कहा जाता है। जिसमें तन और मन दोनों के रंग भरे हैं। यूं तो होली को मनाने के पीछे कई कहानियां जुड़ी हुई हैं जैसे प्रह्लाद की बुआ होलिका की कहानी जो बुरे मन रुपी होलिका को जला डालने की प्रेरणा देती है; पर  देखा जाए तो शीत का अवसान है, ग्रीष्म अभी दूर है, ऋतुराज बसंत का एक क्षत्र राज सम्पूर्ण पृथ्वी पर दृष्टिगोचर होता है, पक्षी जो आलस्य में भरे थे अब कलरव गुंजाते हैं, तितलियां दौड़ती हैं तो भंवरे मदमाते हैं, सूर्य देव भी धरा को अधिक देर तक निहारते हैं और समस्त प्रकृति जनजाति को, जो स्वयं अपनी उगायी फसल देख कर भाव-विभोर हो रही है,  उदीप्त करती हैं। प्रकृति और सौंदर्य एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों भाव जगाते हैं साथ ही अभिव्यक्ति भी कराते हैं। जब स्वयं शासक(बसंत) बाण(काम) संधान करें तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (शिव- कर्ता,हर्ताएवं भर्ता) ही आखेटित हो जाता है और यह क्रम युगों-युगों से चला आ रहा है। जब प्रकृति जो आत्मबोध की  सहचरी है स्वयं ही रंग डाल रही हो तो फिर भौतिक शरीर की तो बात ही क्या?होली  जलवायु परिवर्तन की भी परिचायक है, धरापर ऊष्मता बढ़ जाती है तो वायु में शुष्कता जो भोजन और पेय में परिवर्तन का सूचक है।  होली केवल रंगों से खेलने का त्योहार नहीं है बल्कि धरती  के हर रंग को अपनाने का त्योहार है। समानता का त्योहार है।  

One Response to “होली-एक दृष्टिकोण”

  1. उन्मुक्त Says:

    क्या justify करके लिख रहेम हैं। कुछ फेल रही है। इसे right align करके लिखें।

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