श्लेषाधिराज
हिंदी-साहित्य के इतिहास में ऐसे अनेक कवि हुए हैं जिनके कृतित्त्व तो प्राप्त हैं, परंतु व्यक्तित्त्व के विषय में कुछ भी ठीक से पता नहीं है। भक्तिकाल की समाप्ति और रीतिकाल के प्रारंभ के संधिकाल मे भी एक महाकवि हुए हैं जिनके जीवन के विषय में जानकारी के नाम पर मात्र उनका लिखा एक कवित्त ही है, ऐसे श्लेषाधिराज महाकवि ‘सेनापति’ के विषय में लिखना आज ‘मन की बात’ है।
“दीक्षित परसराम, दादौ है विदित नाम,
जिन कीने यज्ञ, जाकी जग में बढ़ाई है।
गंगाधर पिता, गंगाधार ही समान जाकौ,
गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है।
महाजानि मनि, विद्यादान हूँ कौ चिंतामनि,
हीरामनि दीक्षित पै तैं पाई पंडिताई है।
सेनापति सोई, सीतापति के प्रसाद जाकी,
सब कवि कान दै सुनत कविताई हैं॥”
यही कवित्त सेनापति के जीवन परिचय का आधार है। इसके आधार पर विद्वानों ने सेनापति के पितामह का नाम परसराम दीक्षित और पिता का नाम गंगाधर माना हैं। ‘गंगातीर बसति अनूप जिन पाई है’ के आधार पर उन्हें उत्तर-प्रदेश के गंगा-किनारे बसे अनूपशहर क़स्बे का माना है। सेनापति पर शोध कर चुके डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने भी सेनापति के निवास के विषय में ऐसा ही लिखा है: “अनूपशहर-निवासी ९० वर्षीय वयोवृद्ध पंडित मंगलसेनजी ने हमें सन १९७० में बताया था कि उन्होंने अपने पिता से बचपन में यही सुना था कि सेनापति के पिता अनूपशहर में लकड़ी के मुनीम बनकर आए थे।………..अनूपशहर की ‘हिंदी साहित्य परिषद’ ने जिस स्थान पर ‘सेनापति-स्मारक बनवाया है वह स्थान भी मंगलसेनजी ने अपने पिता से सेनापति के मकान के रुप में ही सुना था।”
सेनापति के विषय में कोई पुष्ट प्रमाण नहीं हैं फिर भी अनूपशहर में सम्मानस्वरुप सेनापति-स्मारक बनाया हुआ है और श्रद्धांजलि स्वरुप हर साल शरद-पूर्णिमा को कवि-सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। उस मंच से राष्ट्र-कवि सोहनलाल द्विवेदी जैसी महानविभूतियाँ कविता पाठ करके महाकवि सेनापति को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित कर चुकी हैं।
सेनापति के विषय में विद्वानों ने माना है कि उन्होंने ‘काव्य-कल्पद्रुम’ और ‘कवित्त-रत्नाकर’ नामक दो ग्रंथों की रचना की थी। ‘काव्यकल्पद्रुम’ का कुछ पता नहीं है। ‘कवित्तरत्नाकर’ उनकी एक मात्र प्राप्त कृति है। इस विषय में डॉ. चंद्रपाल शर्मा ने कहीं लिखा है-”सन १९२४ में जब प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन अध्यापन प्रारंभ हुआ, तब कविवर सेनापति के एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ ‘कवित्त-रत्नाकर’ को एम.ए. के पाठ्यक्रम में स्थान मिला था। उस समय इस ग्रंथ की कोई प्रकाशित प्रति उपलब्ध नहीं थी। अतः केवल कुछ हस्तलिखित पोथियाँ एकत्रित करके पढ़ाई प्रारंभ की थी। सन १९३५ में प्रयाग विश्वविद्यालय के रिसर्चस्कॉलर पं.उमाशंकर शुक्ल ने एक वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद इस ग्रंथ की विविध हस्तलिखित प्रतियों को सामने रखकर एक मान्य प्रति तैयार की थी, जो प्रयाग-विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने प्रकाशित करायी थी। ‘
कवि की निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर ‘कवित्त-रत्नाकर’ के विषय में माना जाता रहा है कि उन्होंने इसे सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्ध में रचा होगा-
“संवत सत्रह सै मैं सेई सियापति पांय,
सेनापति कविता सजी, सज्जन सजौ सहाई।”
अपनी कविताई के विषय में कवि ने लिखा है-
“राखति न दोषै पोषे पिंगल के लच्छन कौं,
बुध कवि के जो उपकंठ ही बसति है।
जोय पद मन कौं हरष उपजावति, है,
तजै को कनरसै जो छंद सरस्ति हैं।
अच्छर हैं बिसद करति उषै आप सम,
जातएं जगत की जड़ताऊ बिनसति है।
मानौं छबि ताकी उदबत सबिता की सेना-
पति कबि ताकि कबिताई बिलसति हैं॥”अन्य देखें-
“तुकन सहित भले फल कौं धरत सूधे,
दूरि कौं चलत जे हैं धीर जिय ज्यारी के।
लागत बिबिध पच्छ सोहत है गुन संग,
स्रवन मिलत मूल कीरति उज्यारी के।
सोई सीस धुनै जाके उर मैं चुभत नीके’
बेग बिधि जात मन मोहैं नरनारी के।
सेनापति कबि के कबित्त बिलसत अति,
मेरे जानबान हैं अचूक चापधारी के।”
कवि को अपनी रचना चोरी हो जाने का भय भी था, तभी तो उन्होंने लिखा है-
“बानी सौ सहित, सुबरन मुँह रहैं जहाँ,
धरति बहु भांति अरथ समाज कौ।
संख्या कर लिजै, अलंकार हैं अधिक यामैं,
रखौ मति ऊपर सरस ऐसे साज कौं।
सुनै महाराज चोरि होत चारचरन की ,
तातैं सेनापति कहैं तजि करि ब्याज कौं।
लीजियौं बचाइ ज्यौं चुराबै नाहिं कोई सौपी,
बित्त की सी थाति है, कबित्तन की राज कौं।”
कवित्त, छ्प्पय और कुंडली छंदों में रचित ‘कवित्त-रत्नाकर’ पाँच तरंगों में विभक्त है। अध्यायों को तरंग कहा गया है।
प्रथम तरंग- श्लेष-वर्णन है, जिसमें ९६ पद हैं जिनमें श्लेष-योजना आजतक अतुलनीय और अनुपमेय है। कवि ने स्वयं लिखा है-
“मूढ़न कौ अगम, सुगम एक ताकौ, जाकी,
तीछन अमल बिधि बुद्धि है अथाह की।
कोई है अभंग, कोई पद है सभंग, सोधि,
देखे सब अंग, सम सुधा के प्रवाह की।
ज्ञान के निधान , छंद-कोष सावधान जाकी,
रसिक सुजान सब करत हैं गाहकी।
सेवक सियापति कौ, सेनापति कवि सोई,
जाकी द्वै अरथ कबिताई निरवाह की॥”
दूसरी तरंग में ७४ कवित्त में श्रंगार वर्णन है। यहाँ कवि ने अपने पूर्वज कवियों की परंपरा को निभाया है।-
(१) “लीने सुघराई संग सोहत ललित अंग,
सुरत के काम के सुघर ही बसति है।
गोरी नव रस रामकरी है सरस सोहै,
सूहे के परस कलियान सरसति है।
सेनापति जाके बाँके रुप उरझत मन,
बीना मैं मधुर नाद सुधा बरसति है।
गूजरी झनक-झनक माँझ सुभग तनक हम,
देखी एक बाला राग माला सी लसति है॥”
(२) “कौल की है पूरी जाकी दिन-दिन बाढ़ै छवि,
रंचक सरस नथ झलकति लोल है।
रहैं परि यारी करि संगर मैं दामिनी सी,
धीरज निदान जाहि बिछुरत को लहै।
यह नव नारि सांचि काम की सी तलबारि है,
अचरज एक मन आवत अतोल है।
सेनापति बाहैं जब धारे तब बार-बार,
ज्यौं-ज्यौं मुरिजात स्यौं, त्यौं अमोल हैं॥”
तृतीय तरंग में ६२ कवित्तों में षडऋतु-वर्णन है। कुछ बानगी देखें-
(१)”तीर तैं अधिक बारिधार निरधार महा,
दारुन मकर चैन होत है नदीन कौ।
होति है करक अति बदि न सिराति राति,
तिल-तिल बाढ़ै पीर पूरी बिरहिन कौं।
सीरक अधिक चारों ओर अबनई रहै ना,
पाऊँरीन बिना क्यौं हूँ बनत धनीन कौं।
सेनापति बरनी है बरषा सिसिरा रितु,
मूढ़न कौ अगम-सुगम परबीन कौं।
(२) “धरयौ है रसाल मोर सरस सिरच रुचि,
उँचे सब कुल मिले गलत न अंत है।
सुचि है अवनि बारि भयौ लाज होम तहाँ,
भौंरे देखि होत अलि आनंद अनंत है।
नीकी अगवानी होत सुख जन वासों सब,
सजी तेल ताई चैंन मैंन भयंत है।
सेनापति धुनि द्विज साखा उच्चतर देखौ,
बनौ दुलहिन बनी दुलह बसंत है।”
चतुर्थ तरंग में ७६ कवित्त हैं जिनमें रामकथा मुक्त रुप में लिखी है।-
“कुस लव रस करि गाई सुर धुनि कहि,
भाई मन संतन के त्रिभुवन जानि है।
देबन उपाइ कीनौ यहै भौ उतारन कौं,
बिसद बरन जाकी सुधार सम बानी है।
भुवपति रुप देह धारी पुत्र सील हरि
आई सुरपुर तैं धरनि सियारानि है।
तीरथ सरब सिरोमनि सेनापति जानि,
राम की कहनी गंगाधार सी बखानी है।”
पाँचवी तरंग में ८६ कवित्त हैं, जिनमें राम-रसायन वर्णन है। इनमें राम, कृष्ण, शिव और गंगा की महिमा का गान है। ‘गंगा-महिमा’ दृष्टव्य है-
“पावन अधिक सब तीरथ तैं जाकी धार,
जहाँ मरि पापी होत सुरपुरपति है।
देखत ही जाकौ भलौ घाट पहिचानियत,
एक रुप बानी जाके पानी की रहति है।
बड़ी रज राखै जाकौ महा धीर तरसत,
सेनापति ठौर-ठौर नीकी यैं बहति है।
पाप पतवारि के कतल करिबै कौं गंगा,
पुन्य की असील तरवारि सी लसति है।”
सेनापति ने अपने काव्य में सभी रसों को अपनाया है। ब्रज भाषा में लिखे पदों में फारसी और संस्कृत के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अलंकारों की बात करें तो सेनापति को श्लेष से तो मोह था। अपने काव्य पर भी कवि को गर्व था-
“दोष सौ मलीन, गुन-हीन कविता है, तो पै,
कीने अरबीन परबीन कोई सुनि है।
बिन ही सिखाए, सब सीखि है सुमति जौ पै,
सरस अनूप रस रुप यामैं हुनि है।
दूसन कौ करिकै कवित्त बिन बःऊषन कौ,
जो करै प्रसिद्ध ऐसो कौन सुर-मुनि है।
रामै अरचत सेनापति चरचत दोऊ,
कवित्त रचत यातैं पद चुनि-चुनि हैं।”
सेनापति ने तीनों गुणों प्रसाद, ओज और माधुर्य का निर्वाह किया है। माधुर्य का उदाहरण पठनीय है-
“तोरयो है पिनाक, नाक-पल बरसत फूल,
सेनापति किरति बखानै रामचंद्र की,
लैकै जयमाल सियबाल है बिलोकी छवि,
दशरथ लाल के बदन अरविंद की।
परी प्रेमफंद, उर बाढ़्यो है अनंद अति,
आछी मंद-मंद चाल,चलति गयंद की।
बरन कनक बनी बानक बनक आई,
झनक मनक बेटी जनक नरिंद्र की।”
शब्द-शक्ति के संदर्भ में देखा जाए तो कवि ने अमिधा को अच्छे से अपनाया है।
अंतः सेनापति विद्वान थे। काव्य-शिल्प में निष्णात थे, तभी तो ‘मिश्र-बंधुओं’ ने उन्हें नवरत्न के बाद का सर्वश्रेष्ठ कवि मना है। नीचे अनूपशहर स्थित ‘सेनापति-स्मारक भवन’ का चित्र है।

October 10, 2006 at 4:40 pm
ये कहां से ढ़ूंढ किये? नाम भी पहली बार सुन रहा हूँ!
-वैभव
October 10, 2006 at 5:10 pm
बहुत खूब! साधुवाद, रीतिकाल के महान कवि सेनापति के कवित्त रस को प्रस्तुत करने के लिए।
किन्तु सेनापति के ऋतु वर्णन के प्रसिद्ध छंद वे माने जाते हैं जिनमें श्लेष का वर्णन नहीं है। श्लेष भाषिक चमत्कार की सृष्टि भले करते हों, लेकिन उनका कृत्रिम प्रयोग सृजनात्मक अभिव्यक्ति के सहज प्रवाह को भंग भी करता है।
श्लेष से अधिक सेनापति अपने कवित्तों की बंदिश में कमाल करते हैं और उसके सहारे ही वह पूरे वातावरण की सृष्टि कर डालते हैं। जैसे कि ग्रीष्म ऋतु वर्णन का यह छंद देखिए-
वृष कौं तरनि सहसौ किरन करि,
ज्वालन के जाल बिकराल बरसत है।
तचत धरनि, जग जरत झरनि, सीरी
छाँह कौं पकरि पंथी-पंछी बिरमत है।
उक्त छंद में लघु और दीर्घ ध्वनियों का ऐसा क्रम बन पड़ा है कि ग्रीष्म ऋतु का वातावरण साक्षात व्यक्त होने लगता है। लघु स्वरों में दुपहरी का सन्नाटा सुनाई देता है है तो दीर्घ ध्वनियों में उसकी विकरालता दिखाई देती है।
October 10, 2006 at 9:20 pm
सृजन-शिल्पीजी समालोचनात्मक टिप्पणी करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। सराहनीय और अनुकरणीय प्रयास है।
ऐसी गवेष्णात्मक तथ्य्परक टिप्पणी का हमेशा स्वागत है , इससे विषय को व्यापकता और गहराई मिलती है और लेख की स्वस्थ- आलोचना होती है जिससे लेखक को भी अपने लेखन के बारे में पता चलता है।
प्रस्तुत लेख सेनापति के श्लेषवर्णन को प्राथमिकता देते हुए लिखा है। यही सोचकर यह शीर्षक दिया ।संपूर्ण काव्य-सौंदर्य वृहत्त निबंध में लिखा जासकता है। फिर कभी प्रयास करुंगी। पुनः धन्यवाद।
October 11, 2006 at 6:32 am
सेनापति के ऊपर लेख और उनकी कवितायें देख कर बहुत प्रसन्नता हुई। उनके जीवन के बारे में आपने जो जानकारी दी, मुझे मालूम नहीं थी। मैं ने सेनापति की कुछ कवितायें 9वीं और दसवीं कक्षा में पढ़ी थीं। उनमें से दो के कुछ अंश याद हैं। यदि आप इनको पूरी कर सकें तो बहुत आभार होगा मुझ पर:
1. सेनापति उनये नये जलद सावन के दसहूँ दिशानि घुमड़ानि भरे तोय के
2. जिनके मिलत भली प्रापति की घटी होति, मंगन को देखि पट देत देत बार बार हैं।
सेनापति काव्य की रचना विचारौ या में, दाता और सूम दोऊ कीन्हे इकसार हैं।
October 11, 2006 at 10:17 pm
लक्ष्मीनारायणजी ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद।
आपने दो कवित्तों को पूरा करने के लिए लिखा है, प्रथम पद तो आज मिला नहीं हो सके तो पहले पद की एकाध पंक्ति और लिखने का कष्ट करें तब शायद ढूंढ लूँ|
दूसरा पूरा लिख रही हूँ,पढ़कर आनंद उठाएं-
“नाहीं नाहीं करैं थोरी मांगे सब दैन कहें,
मंगन कौ देखि पट देत बार बार हैं।
जिनकौं मिलत भली प्रापति की घटी होति,
सदा सब जन मन भाए निराधार हैं।
भोगी ह्वै रहत बिलसत अवनी के मध्य,
कन कन जारैं दान पाठ परिवार है।
सेनापति बचन की रचना बिचारौ जामैं,
दाता अरु सूम दोऊ कीने इकसार है।”
सादर
प्रेमलता
October 12, 2006 at 6:22 am
प्रेमलता जी,
एक पद पूरा करने के लिये अति धन्यवाद। दूसरे पद की एक ही पंक्ति याद है। कोशिश करने पर भी और याद नहीं आ रही है।
सस्नेह,
लक्ष्मीनारायण