दया-धर्म

By प्रेमलता पांडे

दया धर्म की मूल है,
आज हो गयी फिजूल है,
दया तो दिखायी जाती है,
उसकी क़ीमत लगायी जाती है,
दया तो अपनों पर की जाती है,
दूसरों को तो दया की सीख दी जाती है।
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धर्म एक रास्ता है,
जो सत्य-अहिंसा से साजता है,
पर आज यह बदल गया है,
इसका रुप बिगड़ गया है,
हो गया है बहुत सँकुचित,
बताता नहीं क्या है अनुचित,
कोई रास्ते की गंदगी साफ कर दो,
समभाव की टाइल्स बिछा दो।
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2 Responses to “दया-धर्म”

  1. Udan Tashtari Says:

    बढ़ियां है…

  2. अनूप शुक्ला Says:

    समभाव की टाइल्स बिछाने के लिये पुरानी जमीन तोड़नी पड़ती है।

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