सोच
हम( मानव) विकास की चरम सीमाओं को छू रहे हैं, सर्वत्र विज्ञान के चमत्कारों की चकाचौंध है। जीवन में भौतिक सुखों की बढ़ोत्तरी हुई है या यूँ कह सकते हैं कि जीवन जीना बहुत आसान हो गया है। वैज्ञानिक सोच बढ़ी है-तर्क, विश्लेषण और प्रतिक्रिया के गुण व्यवहार में ज़्यादा दिखायी देते हैं। सूचना-तकनीक ने तो कायाकल्प ही कर दिया है। ब्रह्मांड की दूरी पूर्णतः समाप्त करने की ठान ली है।
एक भी विषय या क्षेत्र ऎसा नहीं है जहाँ अनुसंधान ना हो रहे हों, परंतु ‘क्या हम सही दिशा में सोच रहे हैं?’ यह अनुसंधान अभी बहुत पिछड़ा हुआ है क्योंकि हम खोजों के विषय,उपकरण, प्रयोग और तत्काल अनुभवों एवं निष्कर्षों को ही अंतिम रुप मान लेते हैं। प्रभाव के बाद आने वाले परिणामों को या तो उपेक्षित रखा जाता है या फिर दुष्परिणाम निकल आने पर उस बारे में सोचा जाता है। इसके अतिरिक्त सभी विषयों का परस्पर संगठित ना होना भी एक कारण हो सकता है। उदाहरणतः चिकित्सा विज्ञान ने तो मृत्यु दर घटा दी परंतु समाजविज्ञान विसंगतियाँ ना हटा पाया और वृद्ध-समस्या का जन्म हो गया या कृषि-विज्ञान ने तो फसल पैदावार बढ़ा दी परंतु कई देशों में भुखमरी फैली हुई है। इस तरह हम बहुत आगे बढ़कर भी बहुत पीछे हैं। विज्ञान तो दुर्गम्य रास्तों पर प्रकाश फैला रहा है परन्तु चलने वाले ही ग़लत मुड़ जाएँ तो!
July 1, 2006 at 1:02 am
सही कहा आपने. किसी नये अन्वेषण के पहले शायद ही उसके दूरगामी प्रभावों पर हमारा ध्यान जाता है।
July 1, 2006 at 12:01 pm
प्रेमलता जी, विज्ञान सिर्फ ऐक सोच है जोकि शोधकर्ता की सोच पर आधारित है, शोध सर्वयापी नही सन्कुचित होती है। कारण यह है कि शोध controlled conditions मे होती है। परस्पर संगठित होना इस कारण से सम्भव नही है।
यह तो भानुमती का वो पिटारा है जिसे जितना खन्गाले उतना ही कुछ नया मिलेगा। पथिक अगर गलत ना हो तो विज्ञान हि रुक जायेगा। Every new problem will make us look for new solutions. विभिन्न वैग्यानिक दिशाओ मे परस्पर तारतम्य लाना हि नये प्रयास हॅ।