आकर्षण

By प्रेमलता पांडे

मेरा तुमसे क्या संबंध है?
जिसमें ना कोई बंध है,
समय का कोई भेद नहीं,
दूरी नज़दीकी का खेद नहीं।
रात को तुम मन के दरवाज़े खोलते हो,
ना जाने क्या-क्या बोलते हो।
मैं आकर्षित हो जाती हूँ,
नयनों के रथ पर चढ़ जाती हूँ
और तुम्हारी ओर खिचती चली आती हूँ।
तुम ना जाने कहाँ चले जाते हो,
जितनी पास आऊँ उतना दूर हो जाते हो,
ना अपना आभास जताते हो।
नक्षत्र मुझे लुभाते हैं,
अपनी-अपनी ओर बुलाते हैं,
तुम्हारी हक़ीकत बताते हैं।
चँद्रमा भी मुस्कराता है,
मुझे चाँदनी से मिलवाता है,
तुम्हारी शून्यता बताता है।
बड़ी मुश्किल से विश्वास आता है,
फिर भी ध्यान तुम्हारी ओर ही जाता है,
तुम्हें खोजता रह जाता है।
ना जाने यह कैसा आकर्षण है,
अँधेरे में शून्य का निमँत्रण है,
जो खींचता अपनी ओर हर क्षण है।

Tags:

3 Responses to “आकर्षण”

  1. ई-छाया Says:

    बहुत सुंदर।

  2. Manish Says:

    ना जाने यह कैसा आकर्षण है,
    अँधेरे में शून्य का निमँत्रण है,

    सुन्दर कल्पना!

  3. ratna Says:

    कविता में भावों का आकर्षण है ।

जवाब छोडे