१
राह चलते चलते
पत्थर से जो टकराया,
बड़ी मुश्किल से
गिरने से बच पाया।
फिर भी पैर तो
रक्त से लथपथाया।
पर संतोष है कि
भविष्य में ठीक से
चलना तो आया।
२
धोखे से वार करने वालों
वार का मतलब तो जानो,
वार करने वाले वीर होते हैं,
सामने डटते हैं और धीर होते हैं।
पीछे से वार करने वाले होते हैं कायर,
वीरता तो दूर मन पूरी तरह
होते हैं घायल।
३
उड़ती तो पतँग भी है
पर पँछी नहीं होती।
लगती ही तो उड़ती सी है
पर डोर से बँधी होती।
घूम सकती है उतना
जितनी डोर हो साथ।
पँछी तो उड़ता है चाहे जितना
आता नहीं कभी किसी के हाथ।
(१ एवं ३ अनुभूति में प्रकाशित हो चुकी हैं।)
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June 27, 2006 at 19:17 |
सभी को धन्यवाद। शुऎब मैं तो मन की बात कह देती हूँ।
-प्रेमलता
June 25, 2006 at 20:58 |
मुझे कावीता लिखना नहीं आता मगर मगर दूसरों का पढ कर कुछ समझ में आता है। आपके का हर एक शब्द बहुत सही लिखा है।
June 21, 2006 at 15:28 |
सुन्दर भावपूर्ण रचना
June 20, 2006 at 21:22 |
सभी बहुत खूब हैं
June 18, 2006 at 14:22 |
तीनों बातें बढ़िया बताईं आपने।अच्छी लगीं।
June 18, 2006 at 11:40 |
सभी रचनाएं सुन्दर है ।
June 18, 2006 at 10:19 |
तीनो ही पसन्द आई. बहुत खुब.
June 18, 2006 at 03:17 |
तीनों ही क्षणिकायें अत्यंत भावपूर्ण हैं।
लिखते रहिये,
धन्यवाद!
June 18, 2006 at 01:29 |
पीछे से वार करने वाले होते हैं कायर,
वीरता तो दूर मन पूरी तरह
होते हैं घायल।
ये पंक्तियाँ खास तौर पर पसंद आईं !