आकाश तारों से खिला है,
चंद्रमा उसमें चला है,
तू बटोही क्यों रुका है ?
अपनी राह क्यों नहीं चला है ?
रुककर खड़ा ना रह पाएगा,
तूफ़ानों में घिर जाएगा।
आँधियां उड़ा देती हैं,
रुकने वाले को ज़बरन चला देती हैं।
राह भी भूल जाएगा,
इधर-उधर भटका रह जाएगा।
चारों ओर देख ले,
मन में अपने सोच ले,
क्या कभी कोई रुका है ?
बिना चले ही टिका है ?
मंज़िल पर पहुंचना तो है,
अभीष्ट को पाना भी है,
फिर क्यों सोचता है ?
अपनी राह छोड़ता है,
चल आगे आगे चल,
अपने आप मिट जाएगा छल,
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।
May 17, 2006 at 22:22 |
अच्छी कविता है प्रेमलता जी।
May 12, 2006 at 02:00 |
भाव सुन्दर है
May 11, 2006 at 18:38 |
प्रतीक,ई-शैडो और समीर भाई पंक्तियाँ अच्छी लगीं बहुत बहुत धंयवाद।
प्रेमलता पांडे
May 11, 2006 at 07:01 |
बहुत बढिया, हमेशा की तरह एक नया स्वरुप लिये.
समीर लाल
May 11, 2006 at 00:23 |
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।
बहुत सुन्दर प्रेरणादायक कविता है।
May 10, 2006 at 23:07 |
प्रेमलता जी, आपकी यह उत्साहवर्धक कविता बहुत अच्छी लगी।