चींटी तुमने क्या दृढ़ इच्छा-शक्ति पायी है !
सारी सृष्टि की बात झुठलायी है।
ना सोती हो, ना रोती हो,
सारा जीवन कर्म का बोझ ढ़ोती हो !
क्या तुम्हें आराम करना अच्छा नहीं लगता?
या फिर काम करना ही आराम लगता है।
हम तो जल्दी थक जाते हैं,
पूरा पूरा आराम फरमाते हैं,
इस पर भी अनेक रोग लग जाते हैं,
सारा बल डाक्टर के पास जाने में लगाते हैं।
तुम कभी बीमार नहीं होतीं ?
ना कभी डाक्टर की सलाह लेतीं,
बस इधर से उधर जाती रहती हो,
सब मिलकर भगती रहती हो।
क्या यह बात मनुष्य को नहीं समझाओगी,
उसका शरीर आरामपरस्त हो गया है।
उसका सारा ध्यान सुखों की ओर हो गया है,
उसे इतना नहीं बतलाओगी ?
परिश्रम से ही ज़िंदगी संवरती,
आराम से ही परेशानी मिलती।
Tags: चींटी, दॄढ़ इच्छा-शक्ति, लघु जीव
April 16, 2009 at 15:10 |
really your poem is very good & one can feel it
March 6, 2009 at 12:23 |
[...] सभी महान हैं। कौन कमतर और कौन ज़्यादा? चींटीं से सबक़ तो लिया ही जा सक्ता है। लेखन एक [...]
April 14, 2006 at 08:57 |
कविता की सराहना के लिए धंयवाद समीर जी। प्रेमलता
April 11, 2006 at 21:52 |
“हम तो जल्दी थक जाते हैं,
पूरा पूरा आराम फरमाते हैं,
इस पर भी अनेक रोग लग जाते हैं,
सारा बल डाक्टर के पास जाने में लगाते हैं।”
वाह, प्रेमलता जी.बहुत खुब.
समीर लाल